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________________ -यतीन्द्रसूरि स्मारक ग्रन्थ- जैन साधना एवं आचार विकास हुआ। आज भी प्रतिक्रमण षडावश्यकों के साथ किया जाता है। श्वेताम्बर - परम्परा के आवश्यकसूत्र एवं दिगम्बर और यापनीय परम्परा के मूलाचार में इन षडावश्यकों के उल्लेख हैं। ये षडावश्यक कर्म हैंसामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, गुरुवंदन, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग (ध्यान) और प्रत्याख्यान । यद्यपि प्रारम्भ में इन षडावश्यकों का सम्बन्ध मुनि जीवन से ही था, किन्तु आगे चलकर उनको गृहस्थ उपासकों के लिए भी आवश्यक माना गया। आवश्यकनिर्मुक्ति" में वंदन कायोत्सर्ग आदि की विधि एवं दोषों की जो चर्चा है, उससे इतना अवश्य फलित होता है कि क्रमशः इन दैनन्दिन क्रियाओं को भी अनुष्ठानपरक बनाया गया था। आज भी एक रूढ़ क्रिया के रूप में ही षडावश्यकों को सम्पन्न किया जाता है। जहाँ तक गृहस्थ उपासकों के धार्मिक कृत्यों या अनुष्ठानों का प्रश्न है, हमें उनके सम्बन्ध में भी ध्यान एवं उपोषथ या प्रौषध विधि के ही प्राचीन उल्लेख उपलब्ध होते हैं उपासकदशासूत्र में शकडालपुत्र एवं कुण्डकौलिक के द्वारा मध्याह्न में अशोकवन में शिलापट्ट पर बैठकर उत्तरीय वस्त्र एवं आभूषण उतारकर महावीर की धर्मप्रज्ञप्ति की साधना अर्थात् सामायिक एवं ध्यान करने का उल्लेख है। बौद्ध- त्रिपिटक साहित्य से यह ज्ञात होता है कि निग्रंथ श्रमण अपने उपासकों को ममत्वभाव का विसर्जनकर कुछ समय के लिए समभाव एवं ध्यान की साधना करवाते थे। इसी प्रकार भगवतीसूत्र में भोजनोपरान्त अथवा निराहार रहकर श्रावकों के द्वारा प्रौषध करने के उल्लेख मिलते हैं। त्रिपिटक में बौद्धों ने निर्मयों के उपोषथ की आलोचना भी की है। इससे यह बात पुष्ट होती है कि सामायिक, प्रतिक्रमण एवं प्रौषध की परम्परा महावीरकालीन तो है ही। Jain Education International सूत्रकृतांगसूत्र में महावीर की जो स्तुति उपलब्ध होती है, वह सम्भवत: जैन परम्परा में तीर्थंकरों के स्तवन का प्राचीनतम रूप है। उसके बाद कल्पसूत्र, भगवतीसूत्र एवं राजप्रश्नीयसूत्र में हमें वीरासन के शक्रस्तव (नमोत्थुणं) का पाठ करने का उल्लेख प्राप्त होता है। दिगम्बरपरम्परा में आज वंदन के अवसर पर जो 'नमोऽस्तु' कहने की परम्परा है यह इसी 'नमोत्युर्ण' का संस्कृत रूप है दुर्भाग्य से दिगम्बर- परम्परा में यह प्राकृत का सम्पूर्ण पाठ सुरक्षित नहीं रह सका। चतुर्विंशतिस्तव । का एक रूप आवश्यकसूत्र में उपलब्ध है, इसे 'लोगस्स' का पाठ भी कहते हैं। यह पाठ कुछ परिवर्तन के साथ दिगम्बर- परम्परा के ग्रंथ तिलोयपण्णाति में भी उपलब्ध है। तीन आयतों के द्वारा 'तिक्खुत्तो' के पाठ से तीर्थंकर गुरु एवं मुनि वंदन की प्रक्रिया भी प्राचीनकाल में प्रचलित रही है। अनेक आगमों में तत्सम्बन्धी उल्लेख हैं। श्वेताम्बर परम्परा में प्रचलित 'तिखुत्तो के पाठ का भी एक परिवर्तित रूप हमें षट्खण्डागम के कर्म अनुयोगद्वार के २८वें सूत्र में मिलता है। तुलनात्मक अध्ययन के लिए दोनों पाठ विचारणीय हैं। गुरुवंदन के लिए 'खमासमना' के पाठ की प्रक्रिया उसकी अपेक्षा परवर्तीीं है। यद्यपि यह पाठ आवश्यकसूत्र जैसे अपेक्षाकृत प्राचीन आगम में मिलता है, फिर भी इसमें प्रयुक्त क्षमाश्रमण या क्षपकश्रमण (खमासमणो) शब्द के आधार पर इसे चौथी, पाँचवीं शती के लगभग का माना जाता है क्योंकि तब से जैनाचार्यों के लिए 'क्षमाश्रमण' पद का प्रयोग होने लगा था। गुरुवंदन पाठों से ही चैत्यों का निर्माण होने पर चैत्यवंदन का विकास हुआ और चैत्यवंदन की विधि को लेकर अनेक स्वतंत्र ग्रंथ भी लिखे गये है। जिनपूजा विधि का विकास इसी स्तवन एवं वंदन की प्रक्रिया का विकसित रूप जिनपूजा में उपलब्ध होता है, जो कि जैन-अनुष्ठान का महत्त्वपूर्ण एवं अपेक्षाकृत प्राचीन अंग है। वस्तुतः वैदिक यज्ञ-यागपरक कर्मकाण्ड की विरोधी जनजातियों एवं भक्तिमार्गी परम्पराओं में धार्मिक अनुष्ठान के रूप में पूजा-विधि का विकास हुआ था और श्रमण परम्परा में तपस्या और ध्यान का। यक्षपूजा के प्राचीनतम उल्लेख जैनागमों में उपलब्ध हैं। फिर इसी भक्तिमार्गीधारा का प्रभाव जैन और बौद्ध धर्मों पर भी पड़ा और उनमें तप, संयम एवं ध्यान के साथ जिन एवं बुद्ध की पूजा की भावना विकसित हुई। परिणामतः सर्वप्रथम स्तूप, चैत्यवृक्ष आदि के रूप में प्रतीक पूजा प्रारम्भ हुई, फिर सिद्धायतन (जिनमन्दिर) आदि बने और बुद्ध एवं जिन प्रतिमाओं की पूजा होने लगी। फलतः जिन पूजा एवं दान को गृहस्थ का मुख्य कर्तव्य माना गया। दिगम्बर- परम्परा में तो गृहस्थ के लिए प्राचीन षडावश्यकों के स्थान पर निम्न षट् दैनिक कृत्यों की कल्पना की गयी जिन पूजा, गुरु सेवा, स्वाध्याय, तप, संयम एवं दान | - - हमें आचारांगसूत्र, सूत्रकृतांगसूत्र, उत्तराध्ययनसूत्र, भगवतीसूत्र, आदि प्राचीन आगमों में जिन पूजा की विधि का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। अपेक्षाकृत परवर्ती आगमों स्थानांग आदि में जिन - प्रतिमा एवं जिनमन्दिर (सिद्धायतन) के उल्लेख तो हैं, किन्तु उनमें भी पूजा सम्बन्धी किसी अनुष्ठान की चर्चा नहीं है। जबकि 'राजप्रश्नीयसूत्र' में सूर्याभदेव और ज्ञाताधर्मकथा में द्रौपदी के द्वारा जिन प्रतिमाओं के पूजन के उल्लेख हैं। राजप्रश्नीय के वे अंश जिसमें सूर्यामदेव के द्वारा जिनप्रतिमा पूजन एवं जिन के समक्ष नृत्य, नाटक, गान आदि के जो उल्लेख है, वे ज्ञाताधर्मकया से परवर्ती हैं और गुप्तकाल के पूर्व के नहीं है। चाहे 'राजप्रश्नीयसूत्र का प्रसेनजित सम्बन्धी कथा पुरानी हो, किन्तु सूर्याभदेव सम्बन्धी कथा-प्रसंग में जिनमन्दिर के पूर्णतः विकसित स्थापत्य के जो संकेत हैं, वे उसे गुप्तकाल से पूर्व का सिद्ध नहीं करते हैं। फिर भी यह सत्य है कि जिन-पूजा-विधि का इससे विकसित एवं प्राचीन उल्लेख वे० परम्परा के आगम साहित्य में अन्यत्र नहीं है। दिगम्बर - परम्परा में आचार्य कुन्दकुन्द ने भी रयणसार में दान और पूजा को गृहस्थ का मुख्य कर्तव्य माना है, वे लिखते हैं दाणं पूजा मुक्ख सावयधम्मेण सावया तेण विणा । झाणज्झयणं मुक्ख जइ धम्मेण तं विणा सो वि।। अर्थात् गृहस्थ के कर्तव्यों में दान और पूजा मुख्य और यति / श्रमण के कर्तव्यों में ध्यान और स्वाध्याय मुख्य हैं। इस प्रकार उसमें भी पूजा सम्बन्धी अनुष्ठानों को गृहस्थ के कर्तव्य के रूप में प्रधानता मिली। परिणामतः गृहस्थों के लिए अहिंसादि अणुव्रतों का पालन उतना महत्त्वपूर्ण [ १०८ ] For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210773
Book TitleJain Dharm me Puja Vidhan evam Dharmik Anushthan
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZ_Vijyanandsuri_Swargarohan_Shatabdi_Granth_012023.pdf
Publication Year1999
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle, Ritual, & Vidhi
File Size2 MB
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