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________________ Jain Education International ७८ श्री पुष्करमुनि अभिनन्दन ग्रन्थ : अष्टम खण्ड लाख दीनार से एक अंजलि अन्न मोल लिया और दलिया में विष मिलाकर समस्त परिवार के साथ खाने की तैयारी में था। उस समय एक मुनि उसके यहाँ गोचरी के लिए पधारे। सभी स्थिति समझकर गुरुदेव ने निवेदन किया तब आर्य वज्ज्रसेन ने वज्ज्रस्वामी के कहने से सुभिक्ष की घोषणा की और सबके प्राणों की रक्षा की। दूसरे दिन अन्न से परिपूर्ण जहाज आ गये। जिनदास ने वह अन्न लेकर गरीबों को वितरण कर दिया। कुछ समय के पश्चात् वर्षा होने से सर्वत्र आनन्द की उर्मियां उछलने लगीं । जिनदास ने अपनी विराट संपत्ति को जन-कल्याण के लिए न्योच्छावर कर अपने नागेन्द्र, चन्द्र, निवृत्ति और विद्याधर आदि पुत्रों के साथ दीक्षा ग्रहण की। (देखिए कल्पसूत्र ) । दुष्काल के समाप्त होने पर आर्य वज्रसेन ने श्रमणसंघ को पुनः एकता के सूत्र में पिरोया । इस दुष्काल में अनेक श्रमों का स्वर्गवास हो जाने से कई वंश, कुल और गण विच्छेद हो गये । 1 आरक्षित - आर्य वज्रसेन के ही समय में आगमवेत्ता आर्यरक्षित हुए । उनकी जन्मभूमि दशपुर थी । पिता का नाम रुद्रसोम था । जब आप काशी से गंभीर अध्ययन कर लौटे तब माता बहुत प्रसन्न हुई। माता की प्रबल प्रेरणा से दृष्टिवाद का अध्ययन करने के लिए दशपुर के इसुवन में विराजित आचार्य तोसलीपुत्र के पास गये और श्रमण बने । तोसलीपुत्र से आगमों का अध्ययन किया। उसके पश्चात् दृष्टिवाद का अध्ययन करने हेतु आचार्य वज्रस्वामी के पास पहुँचे । साढ़े नौ पूर्व तक अध्ययन किया। आपने अनुयोगद्वार सूत्र की रचना की और आगमों को द्रव्यानुयोग, चरण-करणानुयोग, गणितानुयोग और धर्मकथानुयोग के रूप में विभक्त किया। आपके समय तक प्रत्येक आगम पाठ की द्रव्यानुयोग आदि के रूप में चार-चार व्याख्याएँ की जाती थीं । आपने श्रुतधरों की स्मरणशक्ति के दौर्बल्य को देखकर जिन पाठों से जो अनुयोग स्पष्ट रूप से प्रतिभासित होता था उस प्रधान अनुयोग को रखकर शेष अन्य गौण अर्थों का प्रचलन बन्द कर दिया। जैसेग्यारह बंगों महाकल्पसूत्र और छेदसूत्रों का समावेश चरणकरणानुयोग में किया गया ऋविभासतों का धर्मानुयोग में, सूर्य प्रज्ञप्ति आदि का गणितानुयोग में और दृष्टिवाद का समावेश द्रव्यानुयोग में किया गया। इस प्रकार जब अनुयोगों का पार्थक्य किया गया तब से नयावतार भी अनावश्यक हो गया । १६ प्रस्तुत कार्य द्वादशवर्षीय दुष्काल के पश्चात् दशपुर में किया गया । इतिहासकारों का मत है कि यह आगम-वाचना वीर सं० ५६२ के लगभग हुई। इस आगम वाचना में वाचनाचार्य आर्य नंदिल, युग-प्रधानाचार्य आर्यरक्षित और गणाचार्य वज्रसेन आदि उपस्थित थे। विद्वानों का यह भी मानना है कि आगम साहित्य में उत्तरकालीन महत्त्वपूर्ण घटनाओं का जो चित्रण हुआ है उसका श्रेय भी आरक्षित को है । वीर सं० ५६७ में आर्यरक्षित स्वर्गस्थ हुए। उनके उत्तराधिकारी दुर्बलिकापुष्यमित्र हुए । आर्यरथस्वामी -- ये वज्रस्वामी के द्वितीय पट्टधर थे। आप वसिष्ठ गोत्रीय थे और बड़े ही प्रभावशाली थे । आपका अपर नाम जयन्त भी था जिससे जयन्तिशाखा का प्रादुर्भाव हुआ । आर्यधर्म के आदिल और आज ये दो शिष्यरत्न से स्कंदिल की जन्मभूमि मथुरा भी। गृहस्थाश्रम में आपका नाम सोमरथ था। आर्य सिंह के उपदेश को सुनकर आर्य धर्म के सन्निकट प्रव्रज्या ग्रहण की। ब्रह्मद्वीपिका शाखा के वाचानाचार्य आर्य सिंहसूरि से पूर्वो का अध्ययन किया। वाचक पद प्राप्त कर युगप्रधानाचार्य बने । इतिहास की दृष्टि से उस समय भारत की स्थिति विषम थी । हूणों और गुप्तों में युद्ध हुआ था। बारह वर्ष हुए के दुष्काल से मानव समाज जर्जरित हो चुका था।" जैन, बौद्ध और वैदिक धर्म के अनुयायी परस्पर खण्डन- मण्डन में लगे थे; आदि अनेक कारणों से श्रुतधरों की संख्या कम होती जा रही थी। उस विकट वेला में आर्य स्कंदिल ने श्रुत की सुरक्षा के लिए मथुरा में उत्तरापथ के मुनियों का एक सम्मेलन बुलवाया और आगमों का पुस्तकों के रूप में लेखन किया । यह सम्मेलन वीर सं० ८२७ से ८४० के आसपास हुआ था। उधर आचार्य नागार्जुन ने भी वल्लभी (सौराष्ट्र ) में दक्षिणापथ के मुनियों का सम्मेलन बुलाया । आगमों का लेखन व संकलन किया। ये सम्मेलन दूर-दूर होने से स्थविर एक दूसरे के विचारों से अवगत न हो सके, अतः पाठों में कुछ स्थलों पर भेद हो गये । आचार्य देवद्धगणी - ये जैन आगम साहित्य के प्रकाशमान नक्षत्र हैं। वर्तमान में जो आगम साहित्य उप लब्ध है उसका सम्पूर्ण श्रेय देवद्धगणी क्षमाश्रमण को है। आपका जन्म वेरावल (सौराष्ट्र) में हुआ था। आपके पिता का नाम कार्माद्ध और माता का नाम कलावती था। कहा जाता है भगवान महावीर के समय शक्रेन्द्र का सेनापति हरिणगमेषी देव था । वही आयु पूर्ण कर देवद्धगणी बना । आपने उपकेश गच्छीय आर्य देवगुप्त के पास एक पूर्वतक अर्थ सहित और दूसरे पूर्व का मूल पढ़ा था । आप अन्तिम पूर्वधर थे । आपके बाद कोई भी पूर्वधर नहीं हुआ। आपने वीर सं० ६६० के आस-पास वल्लभी (सौराष्ट्र ) में एक विराट् श्रमण सम्मेलन बुलवाया जिसका नेतृत्व आपने किया । उस सम्मेलन में आगम पुस्तकारूढ़ किये गये । इस आगम वाचना में नागार्जुन की वाचना के गम्भीर अभ्यासी चतुर्थ कालकाचार्य विद्यमान थे। जिन्होंने वीर सं० ६६३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210760
Book TitleJain Dharm Parampara Ek Aetihasik Sarvakshen
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDevendramuni Shastri
PublisherZ_Pushkarmuni_Abhinandan_Granth_012012.pdf
Publication Year
Total Pages14
LanguageHindi
ClassificationArticle & History
File Size2 MB
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