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________________ श्रमण एवं वैदिक धारा का विकास एवं पारस्परिक प्रभाव ६०३ م ه सन्दर्भ ५. भगवान बुद्ध (धर्मानन्द कौसाम्बी), पृ०, २३६-२३९. उत्तराध्ययन, २५/२७, २१. गीता, ४/३३, २६-२८. धम्मपद, ४०१-४०३. उत्तराध्ययन, १२/४६. उत्तराध्ययन, १२/४४. उत्तराध्ययन, ९/४०, देखिये-गीता (शा०) ४/२६-२७. ४. अंगुत्तरनिकाय, सुत्तनिपात उधृत भगवान् बुद्ध (धर्मानन्द ९. धम्मपद, १०६. कौसाम्बी), पृ० २६. १०. सम्बोध प्रकरण, गुर्वाधिकार, जैन धर्म की परम्परा, इतिहास के झरोखे से यद्यपि जनसंख्या की दृष्टि से आज विश्व में प्रति एक हजार प्राचीन काल में आचार और विचारगत विभिन्नताओं के होते हुए भी इन व्यक्तियों में मात्र छह व्यक्ति जैन हैं, फिर भी विश्व के धर्मों के इतिहास ऋषियों में पारस्परिक सौहार्द था। में जैन धर्म का अपना एक विशिष्ट स्थान है क्योंकि वैचारिक उदारता, ऋषिभाषित जो कि प्राकृत जैन आगमों और बौद्ध पालिपिटकों दार्शनिक गंभीरता, विपुल साहित्य और उत्कृष्ट शिल्प की दृष्टि से विश्व में अपेक्षाकृत रूप से प्राचीन है और जो किसी समय जैन परम्परा का के धर्मों में इसका अवदान महत्त्वपूर्ण है। प्रस्तुत निबन्ध में हम इस धर्म महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ माना जाता था, अध्यात्मप्रधान श्रमणधारा के इस परम्परा को इतिहास के आइने में देखने का प्रयास करेंगे। पारस्परिक सौहार्द और एकरूपता को सूचित करता है। यह ग्रन्थ आचारांग के प्रथम श्रुतस्कन्ध के पश्चात् तथा शेष सभी प्राकृत और पालि साहित्य श्रमण परम्परा के पूर्व ई०पू० लगभग चतुर्थ शताब्दी में निर्मित हुआ है। इस ग्रन्थ में विश्व के धर्मों की मुख्यत: सेमेटिक धर्म और आर्य धर्म, ऐसी निर्ग्रन्थ, बौद्ध, औपनिषदिक एवं आजीवक आदि अन्य श्रमण परम्पराओं दो शाखाएँ हैं। सेमेटिक धर्मों में यहूदी, ईसाई और मुसलमान आते हैं के ४५ ऋषियों के उपदेश संकलित हैं। इसी प्रकार बौद्ध परम्परा के ग्रन्थ जबकि आर्य धर्मों में पारसी, हिन्दू (वैदिक), बौद्ध और जैन धर्म की थेरगाथा में भी श्रमण धारा के विभिन्न ऋषियों के उपदेश एवं आध्यात्मिक गणना की जाती है। इनके अतिरिक्त सुदूर पूर्व के देश जापान और चीन अनुभूतियाँ संकलित हैं। ऐतिहासिक एवं अनाग्रही दृष्टि से अध्ययन करने में विकसित कुछ धर्म कन्फूशियस एवं शिन्तो के नाम से जाने जाते हैं। से यह स्पष्ट हो जाता है कि न तो ऋषिभासित (इसिभासियाई) के सभी आर्य धर्मों में जहाँ हिन्दू धर्म के वैदिक स्वरूप को प्रवृत्तिमार्गी ऋषि जैन परम्परा के हैं और न थेरगाथा के सभी थेर (स्थविर) बौद्ध परम्परा माना जाता है वहाँ जैनधर्म और बौद्धधर्म को संन्यासमार्गी या निवृत्तिपरक के हैं। जहाँ ऋषिभाषित में सारिपुत्र, वात्सीपुत्र (वज्जीपुत्त) और कहा जाता है। जैन और बौद्ध दोनों ही धर्म श्रमण परम्परा के धर्म हैं। महाकाश्यप बौद्ध परम्परा के हैं, वहीं उद्दालक, याज्ञवल्क्य, अरुण, श्रमण परम्परा की विशेषता यह है कि वह सांसारिक एवं ऐहिक जीवन असितदेवल, नारद, द्वैपायन, अंगिरस, भारद्वाज आदि औपनिषदिक की दुःखमयता को उजागर कर संन्यास एवं वैराग्य के माध्यम से निर्वाण धारा से सम्बन्धित हैं, तो संजय (संजय वेलट्ठिपुत्त),मंखली गोशालक, की प्राप्ति को जीवन का चरम लक्ष्य निर्धारित करती है। इस निवृत्तिमार्गी रामपुत्त आदि अन्य स्वतन्त्र श्रमण परम्पराओं से सम्बन्धित हैं। इसी प्रकार श्रमण परम्परा ने अपनी तप एवं योग की आध्यात्मिक साधना एवं शीलों थेरगाथा में वर्द्धमान आदि जैन धारा की, तो नारद आदि औपनिषदिक या व्रतों के रूप में नैतिक मूल्यों की संस्थापना की दृष्टि से भारतीय धर्मों धारा के ऋषियों की स्वानुभूति संकलित है। सामान्यतया यह माना जाता के इतिहास में अपना विशिष्ट अवदान प्रदान किया है। इस श्रमण परम्परा है कि श्रमणधारा का जन्म वैदिक धारा की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ में न केवल जैन और बौद्ध धारायें ही सम्मिलित हैं, अपितु औपनिषदिक किन्तु इसमें मात्र आंशिक सत्यता है। यह सही है कि वैदिक धारा और सांख्य-योग की धारायें भी सम्मिलित हैं जो आज बृहद् हिन्दू धर्म प्रवृत्तिमार्गी थी और श्रमण धारा निवृत्तिमार्गी और इनके बीच वासना और का ही एक अंग बन चुकी हैं। इनके अतिरिक्त आजीवक आदि अन्य कुछ विवेक अथवा भोग और त्याग के जीवन मूल्यों का संघर्ष था। किन्तु धाराएं भी थीं जो आज विलुप्त हो चुकी हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से तो श्रमण-धारा का उद्भव मानव व्यक्तित्व के परिशोधन एवं नैतिक तथा अध्यात्मिक मूल्यों के प्रतिस्थापन का ही प्रयत्न पारस्परिक सौहार्द की प्राचीन स्थिति था जिसमें श्रमण-ब्राह्मण सभी सहभागी बने थे। ऋषिभाषित में इन ऋषियों प्राकृत साहित्य में ऋषिभाषित (इसिभासियाई) और पालि को अर्हत् कहना और सूत्रकृतांग में इन्हें अपनी परम्परा से सम्मत मानना, साहित्य में थेरगाथा ऐसे ग्रन्थ हैं जो इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि अति प्राचीन काल में इन ऋषियों की परम्परा के बीच पारस्परिक सौहार्द का Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210753
Book TitleJain Dharm ki Parampara Itihas ke Zarokhe se
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & History
File Size2 MB
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