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________________ -यतीन्द्रसूरि स्मारकग्रन्थ -आधुनिक सन्दर्भ में जैन धर्म में दीक्षित होकर महावीर के पास आया था। फिर भी इतना निश्चित है संबंध में गम्भीर चिन्तन की आवश्कता है। कि ईसा की प्रथम-द्वितीय शताब्दी के बाद तक भी इस आजीवक परम्परा का अस्तित्व रहा है। यह निर्ग्रन्थों एवं बौद्धों की एक प्रतिस्पर्धी श्रमण निर्ग्रन्थ संघ की धर्म प्रसार यात्रा परम्परा थी जिसके श्रमण भी जैनों की दिगम्बर शाखा के समान नग्न भगवान महावीर के काल में उनके निर्ग्रन्थ संघ का प्रभाव क्षेत्र रहते थे। जैन और आजीवक दोनों परम्पराएं प्रतिस्पर्धी होकर भी एक बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा उनके आसपास का प्रदेश ही था। किन्तु दूसरे को अन्य परम्पराओं की अपेक्षा अधिक सम्मान देती थीं, इस तथ्य महावीर के निर्वाण के पश्चात् इन सीमाओं में विस्तार होता गया। फिर की पुष्टि हमें बौद्ध पिटक साहित्य में उपलब्ध व्यक्तियों के षट्विध भी आगमों और नियुक्तियों की रचना तथा तीर्थंकरों की अवधारणा के वर्गीकरण से होती है। निर्ग्रन्थों को अन्य परम्परा के श्रमणों से ऊपर और विकास काल तक उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब एवं पश्चिमी राजस्थान आजीवक परम्परा से नीचे स्थान दिया गया है। इस प्रकार आजीवकों के के कुछ भाग तक ही निर्ग्रन्थों के विहार की अनुमति थी। तीर्थंकरों के निर्ग्रन्थ संघ से जुड़ने एवं अलग होने की यह घटना निम्रन्थ परम्परा की कल्याण क्षेत्र भी यहीं तक सीमित थे। मात्र अरिष्टनेमि ही ऐसे तीर्थंकर एक महत्त्वपूर्ण घटना है। साथ ही निर्ग्रन्थों के प्रति अपेक्षाकृत उदार भाव हैं जिनका संबंध शूरसेन (मथुरा के आसपास के प्रदेश) के अतिरिक्त दोनों संघों की आंशिक निकटता का भी सूचक है। सौराष्ट्र से भी दिखाया गया है और उनका निर्वाण स्थल गिरनार पर्वत माना गया है। किन्तु आगमों में द्वारिका और गिरनार की जो निकटता निर्ग्रन्थ परम्परा में महावीर के जीवनकाल में हुए संघ भेद वर्णित है वह यथार्थ स्थिति से भिन्न है। सम्भवतः अरिष्टनेमि और कृष्ण महावीर के जीवनकाल में निर्ग्रन्थ संघ की अन्य महत्त्वपूर्ण के निकट-सम्बन्ध होने के कारण ही कृष्ण के साथ-साथ अरिष्टनेमि का घटना महावीर के जामातृ कहे जाने वाले जामालि से उनका वैचारिक सम्बन्ध भी द्वारिका से जोड़ा गया होगा। अभी तक इस सम्बन्ध में मतभेद होना और जामालि का अपने पाँच सौ शिष्यों सहित उनके संघ ऐतिहासिक साक्ष्यों का अभाव है। विद्वानों से अपेक्षा है कि इस दिशा से अलग होना है। भगवती, आवश्यक नियुक्ति और परवर्ती ग्रन्थों में में खोज करें। इस सम्बन्ध में विस्तृत विवरण उपलब्ध है। निर्ग्रन्थ संघ-भेद की इस घटना जो कुछ ऐतिहासिक साक्ष्य मिले हैं उससे ऐसा लगता है के अतिरिक्त हमें बौद्ध पिटक साहित्य में एक अन्य घटना का उल्लेख कि निर्ग्रन्थ संघ अपने जन्म स्थल बिहार से दो दिशाओं में अपने प्रचार भी मिलता है जिसके अनुसार महावीर के निर्वाण होते ही उनके भिक्षुओं अभियान के लिए आगे बढ़ा। एक वर्ग दक्षिण-बिहार एवं बंगाल से एवं श्वेत वस्त्रधारी श्रावकों में तीव्र विवाद उत्पन्न हो गया। निर्ग्रन्थ संघ उड़ीसा के रास्ते तमिलनाडु गया और वहीं से उसने श्रीलंका और के इस विवाद की सूचना बुद्ध तक भी पहुँचती है। किन्तु पिटक साहित्य स्वर्णदेश (जावा-सुमात्रा आदि) की यात्राएँ की। लगभग ई०पू० दूसरी में इस विवाद के कारण क्या थे, इसकी कोई चर्चा नहीं है। एक सम्भावना शती में बौद्धों के बढ़ते प्रभाव के कारण निर्ग्रन्थों को श्रीलंका से यह हो सकती है कि यह विवाद महावीर के उत्तराधिकारी के प्रश्न को निकाल दिया गया। फलत: वे पुन: तमिलनाडु में आ गये। तमिलनाडु लेकर हुआ होगा। श्वेताम्बर और दिगम्बर परम्पराओं में महावीर के प्रथम में लगभग ई०पू० प्रथम-द्वितीय शती से ब्राह्मी लिपि में अनेक जैन उत्तराधिकारी को लेकर मतभेद है। दिगम्बर परम्परा महावीर के पश्चात् अभिलेख मिलते हैं जो इस तथ्य के साक्षी हैं कि निर्ग्रन्थ संघ महावीर गौतम को पट्टधर मानती है, जबकि श्वेताम्बर परम्परा सुधर्मा को। श्वेताम्बर के निर्वाण के लगभग दो, तीन सौ वर्ष पश्चात् ही तमिल प्रदेश में परम्परा में महावीर के निर्वाण के समय गौतम को निकट के दूसरे ग्राम पहुँच चुका था। मान्यता तो यह भी है कि आचार्य भद्रबाहु, चन्द्रगुप्त में किसी देवशर्मा ब्राह्मण को प्रतिबोध देने हेतु भेजने की जो घटना वर्णित मौर्य को दीक्षित करने दक्षिण गये थे। यद्यपि इसकी ऐतिहासिक है, वह भी इस प्रसंग में विचारणीय हो सकती है। किन्तु दूसरी सम्भावना प्रामाणिकता निर्विवाद रूप से सिद्ध नहीं हो सकती है क्योंकि जो यह भी हो सकती है कि बौद्धों ने जैनों के श्वेताम्बर एवं दिगम्बर सम्बन्धी अभिलेख घटना का उल्लेख करता है वह लगभग छठी-सातवीं शती परवर्ती विवाद को पिटकों के सम्पादन के समय महावीर के निर्वाण की का है। आज भी तमिल जैनों की विपुल संख्या है और वे भारत में घटना के साथ जोड़ दिया हो। मेरी दृष्टि में यदि ऐसा कोई विवाद घटित जैन धर्म के अनुयायियों की प्राचीनतम परम्परा के प्रतिनिधि हैं। यद्यपि हुआ होगा तो वह महावीर के नग्न रखने वाले श्रमणों के बीच हुआ बिहार, बंगाल और उड़ीसा की प्राचीन जैन परम्परा कालक्रम में विलुप्त होगा, क्योंकि पापित्यों के महावीर के निर्ग्रन्थ संघ में प्रवेश के साथ हो गयी है किन्तु सराक जाति के रूप में उस परम्परा के अवशेष आज ही उनके संघ में नग्न और सवस्त्र ऐसे दो वर्ग अवश्य ही बन गये होंगे भी शेष हैं। 'सराक' शब्द श्रावक का ही अपभ्रंश रूप है और आज और महावीर श्रमणों के इन दो वर्गों को सामायिक-चारित्र और भी इस जाति में रात्रि भोजन निषेध जैसे कुछ संस्कार शेष हैं। छेदोपस्थापनीय-चारित्र धारी के रूप में विभाजित किया होगा। विवाद का कारण ये दोनों वर्ग ही रहे होंगे। मेरी दृष्टि में बौद्ध परम्परा में जिन्हें श्वेत उत्तर और दक्षिण के निर्ग्रन्थ श्रमणों में आधार भेद वस्त्रधारी श्रावक कहा गया, वे वस्तुतः सवस्त्र श्रमण ही होंगे। क्योंकि दक्षिण में गया निम्रन्थ संघ अपने साथ विपुल प्राकृत जैन बौद्ध परम्परा में श्रमण (भिक्षु) को भी श्रावक कहा गया है, फिर भी इस साहित्य तो नहीं ले जा सका क्योंकि उस काल तक जैनागम साहित्य Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210752
Book TitleJain Dharm ki Parampara Itihas ke Zarokhese
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZ_Vijyanandsuri_Swargarohan_Shatabdi_Granth_012023.pdf
Publication Year1999
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & History
File Size2 MB
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