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________________ के है कि किस प्रकार के कंपन का और कितनी मात्रा में उपयोग किया जाय कि परमाणुओं का समूह हमारी इच्छा 'अनुसार कार्यरूप में परिणत हो । भगवान महावीर ने कहा है कि हमारे मुँह से जो शब्द निकलते हैं वे हमें या दूसरों को सुनाई नहीं पड़ते। जो भाषा वा शब्द हमारे मुँह से निकलते हैं, वे इतने सूक्ष्म और तीब्र गतिशील होते हैं कि एक समय जिसका दो भाग नहीं हो सकता, उतने समय में सारे लोकाकाश में वे फैल जाते हैं और दूसरे समय में लोकाकाश के अंतिम हिस्से से टकराकर समूह रूप में परिणित होते हैं तब सामूहिक परमाणु में ध्वनि उत्पन्न होती है जो हमें में ध्वनि उत्पन्न होती है जो हमें सुनाई पड़ती है। इसकी पुष्टि शकभाष्य के प्रथम खण्ड और भगवतीसूत्र, परमाणु उद्देशक, पुदगल उद्देशक और भाषा उद्देशक में मिलती है । उपरोक्त उद्देशकों से यह स्पष्ट हो जाता है कि 'परमाणु' पुदगल के रूप में किस प्रकार परिवर्तित होता है और भाषा वर्गणाओं के लिये कितने परमाणुओं एवं परमाणुओं के स्कंधों की आवश्यकता पड़ती है, जो श्रोतेन्द्रियों के ग्रहण योग्य बनती हैं। वैशेषिक और न्याय दर्शन में भी परमाणु के विषय में बताया गया है कि सूर्य की किरणें छिद्र में से होकर बाहर आती हैं तथा उसमें जो छोटे-छोटे अति सूक्ष्म रजकण दिखाई पड़ते हैं उनका साठवां भाग परमाणु मान लिया गया है । परन्तु जैन दर्शनकारों का कथन है कि अनन्त परमाणुओं का स्कंध बनने पर भी वे दृष्टिगोचर नहीं हो सकते। जैन दर्शनानुसार अनन्त परमाणु के स्कंध वाले, स्कंधों से भी जो अनन्त हो और जब उसका पिण्ड बनता है तब वे इन्द्रिय-ब्राह्म बनते हैं। ऊपर कह आये हैं कि हर एक परमाणु में अपनी विशेष वर्गण शक्ति रहती है। जिस परमाणुओं से भाषा बनती है उन्हें जैन दर्शन में भाषा वर्गणा कहा है । परमाणुओं का स्कंध किस तरह बनता है इसके विषय में कहा गया है कि, 'काय वाङग्रा मन : कर्म Jain Education International उस ध्वनि को योगः' । अर्थात् मन, बचन और काया के योग से जो एक प्रकार का विशेष रूप से कंपन होता है अथवा जिसे कंपन क्रिया कहा जाता है उस कम्पनानुसार ही परमाणुओं का स्वतः संचय होता रहता है। जिस प्रकार चुम्बकीय शक्ति से लोह के परमाणु स्वतः खिच कर उसमें आ मिलते है उसी प्रकार अपने गुणों के अनुसार स्वधर्मी स्वधर्मी में आकर मिलते रहे हैं और कार्यरूप में परिणत होते रहते रहते हैं । उसमें उतारचढ़ाव अथवा हानि और वृद्धि जो होती रहती है उसका कारण आपस में मिलकर और पुनः अलग विलग हो जाने में होती है । सामान्य दृष्टि से कम्पन की मात्रा एक सैकेण्ड में 240 मान ली है और मन्द मध्य तथा तीव्र में विभाजित की है जो 22 श्रुतियों के नाम से कही जाती है। तीब्र में 3800 मात्रायें संगीत के रूप में मान ली गयी है। उससे अधिक मात्रा होने पर वह ध्वनि संगीत न कहलाकर कोलाहल की श्रेणी में आती है। कहने का आशय यह है कि संगीत शास्त्र में जो धतियों और ध्वनि मात्राओं की रूपरेखा तैयार की है, वह सूक्ष्म दृष्टि से न कर स्थूल दृष्टि से है, क्योंकि कार्य रूप में और इंद्रियों के ग्राह्य योग्ण कितना कम्पन कम से कम आवश्यक है, ताकि वह व्यवहार में सुचारु रूप से उपयोग हो सके । इसलिये उस ध्वनि का नाम संगीत रखा - 'सम' अर्थात् सम्यक प्रकार में श्रोतेन्द्रिय की शक्ति में किसी प्रकार से विकार पैदा न करे उसकी शक्ति से वृद्धि और सुचारू रूप से उसमें सहायक भूत हो वह सम्पक ध्वनि ही संगीत कही जाती है। संगीत में तीन अक्षर है संगीत बीच के अक्षर 'गी' अर्थात् ग्रीवा वाणी को निकालने से, 'संत' बचता है। संतों की 'गी' - अर्थात् वाणी को संगीत कहते हैं। रागद्व ेष से रहित संतों के हृदय के भाव उनके उद्गार जो निकलते थे, उसमें ऐसी शक्ति थी कि लोग आकर्षित हो जाते थे और उसको ही भव्य प्राणी लक्ष्य मानकर अनुकरण करते और वही संगीत कहा जाता था । १७२ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210741
Book TitleJain Dharm aur Sangit
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGulabchandra Jain
PublisherZ_Tirthankar_Mahavir_Smruti_Granth_012001.pdf
Publication Year
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle & Art
File Size756 KB
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