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________________ साहू मंगल अर्हन्त भगवान् के मुक्त हो जाने पर उनके पद-चिह्नों पर चल कर स्व-पर कल्याण करने वाले साधु परमेष्ठी होते हैं । कुटुम्ब-परिवार, धन-सम्पत्ति, मित्र-परिकर तथा सांसारिक विषय-वासनाओं, भोग्य-उपभोग्य पदार्थों से ममता व मोह का त्याग कर, शरीर से भी ममत्व दूर करके, तत्काल उत्पन्न (यथाजात) बच्चे का सा निर्विकार नग्न रूप धारण करके, समस्त आरम्भ-कर्मों का त्याग कर जो ५ महाव्रत, ५ समिति, ५ इन्द्रिय-दमन, ६ आवश्यक तथा अचेल, अस्नान, भूमिशयन आदि २८ मूलगुणों तथा उत्तर गुणों का आचरण करते हैं, आत्मध्यान, स्वाध्याय आदि तपस्या से निरन्तर आत्म-शुद्धि करते हैं, वे साधु परमेष्ठी हैं । संसार में न कोई उनका मित्र होता है, न कोई शत्रु । संसार के किसी पदार्थ की इच्छा उनको नहीं होती। ऐसी पुनीत चर्या वाले साधु परमेष्ठी भी जगत् में मंगलरूप हैं क्योंकि वे आत्मशुद्धि में लगे हुए हैं। किसी के अहित का न कोई कार्य करते हैं, न वचन से कोई किसी को हानिकारक, कड़वा तथा असत्य वचन कहते हैं और न उनके मन में किसी के लिये दुर्भावना उत्पन्न होती है। ऐसे पवित्र आत्मा का दर्शन करते ही मन के दुर्विचार दूर हो जाते हैं। उनका उपदेश सुनने से सन्मार्ग पर चलने की भावना जाग्रत होती है । अतः मंगलाचार के लिये 'णमो लोए सव्वसाहूणं' मुख से उच्चारण करो। बन्दों दिगम्बर गुरुचरण, जगतरण तारण जान । जो भरम भारी रोग को हैं, राजवैद्य महान ॥ -इत्यादि स्तुति पढ़ कर मुख तथा मन पवित्र करना चाहिये। केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं केवलज्ञानी अर्हन्त भगवान् का बतलाया हुआ धर्म तो आत्मा को शुद्ध करके परमात्मा बना देता है। उससे बढ़ कर संसार में और मंगल क्या हो सकता है। आत्मा का जो निर्मल स्वभाव है, वही आत्मा का धर्म है । उसी आत्म-धर्म को कठोर तपस्या द्वारा केवली भगवान् प्राप्त करते हैं । अतः उनका बताया हुआ, अनुभूत धर्म ही आत्मा का कल्याण कर सकता है। वह धर्म-वार्ता जिन ग्रन्थों में अंकित है उन धर्म-ग्रन्थों का अध्ययन करने से आत्मज्ञान, परपदार्थ-ज्ञान, कर्मबन्ध, मोक्ष, संवर, निर्जरा आदि उपयोगी तत्त्वों का परिज्ञान होता है। प्रत्येक जीव के साथ दयालुता का व्यवहार करो क्योंकि वे भी तम्हारे समान ही जीव हैं। ऐसा प्राणीमात्र का हितकारी उपदेश उन शास्त्रों से ही मिलता है । मोह और अज्ञान के अन्धकार को दूर करने के लिये वे धर्मग्रन्थ प्रकाश देने वाले दीपक जैसे हैं । अतः जगत् में धर्म, धर्मग्रन्थ भी मंगलरूप हैं। केवलिकन्ये वाङमय-गंगे, जगदम्बे अघ नाश हमारे। सत्यस्वरूपे मंगलरूपे, मन मंदिर में तिष्ठो हमारे ॥ अहंन्त-भक्ति चार घाति कर्म-रहित, अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान, अनन्त सुख और अनन्त बल संयुक्त जीवन्मुक्त अर्हन्त परमेष्ठी होते हैं। उन अर्हन्त परमेष्ठी की भक्ति करना अर्हन्तभक्ति भावना है। यदि सूर्य न हो तो संसार में अन्धकार बना रहे, प्रकाश न हो। इसी तरह यदि अर्हन्त भगवान् न हों तो संसार में ज्ञान का प्रकाश न हो, और अज्ञान-अन्धकार, मोह-अन्धकार संसारी जीवों के आत्मा से दूर न हो सके । अर्हन्त भगवान् ने अपने तपोबल से आत्मा के सबसे अधिक अहित करने वाले घातिया कर्मों को क्षय किया, तभी वे पूर्णज्ञानी, पूर्णसुखी, अनन्त शक्तिशाली और पूर्ण वीतराग बन गये । उस समय उन्होंने समस्त तत्त्वज्ञान, आत्मा को संसार-जाल से छूटने का उपाय प्रतिपादन किया। सिद्ध भगवान् आत्मशुद्धि में अधिक हैं किन्तु लोक-कल्याण में उनसे अधिक अर्हन्त हैं, अत: वे पहले परमेष्ठी हैं। __ वे पूर्ण ज्ञानी थे, इसलिये उनके जानने में कुछ गलती नहीं थी और उनको रंचमात्र भी किसी के साथ न राग था, न द्वेष था। इस कारण निःस्पृह भाव से दिये गये उनके उपदेश में कुछ विकार न था । वीतराग सर्वज्ञ और हितोपदेशी होने के कारण वे समस्त संसार के पूज्य देव बन गये । ये तीनों विशेषताएं संसार के किसी अन्य देव में नहीं पाई जाती । इसी कारण कोई स्त्री-प्रेमवश अपने साथ स्त्री रखता है और कोई अपने शत्रु को मारने के लिए अपने आचार्यरत्न श्री वेशभूषण जी महाराज अभिनन्दन अन्य Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210732
Book TitleJain Dharm evam Bhakti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZ_Deshbhushanji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012045.pdf
Publication Year1987
Total Pages21
LanguageHindi
ClassificationArticle & Worship
File Size2 MB
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