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________________ वे 'कर्म' हैं | इसलिए आत्मा, जब राग-द्वेष आदि विभाव-परिणाम वाली अपनी क्रियाओं के साथ तन्मय हो जाता है, तब उसकी 'तन्मयता' उसका 'भावकर्म' बनती है। इसी आधार पर आत्मा भावकर्मों का ही कर्ता ठहरता है, द्रव्यकर्मों का नहीं 122 चूँकि परिणाम और परिणामी में एकल्पता होती है, और परिणामों का कर्ता भी परिणामी ही होता है । इसलिए पुद्गल का परिणाम भी पुद्गल ही होगा । परिणाम रूप क्रियाओं के साथ सारे के साथ द्रव्य तन्मय बन जाते हैं । अतः पुद्गल का परिणाम भी पुद्गल क्रियामय है, यह मानना चाहिए। जो 'क्रिया' है, वही 'कर्म' है । इसलिए पुद्गल में पुद्गल द्रव्य कर्मरूप परिणामों का ही कर्तृत्व, एक स्वतन्त्र कर्ता के रूप में बनता है, न कि जीव के भावकर्मरूप परिणामों का । इस तरह, पुद्गल रूप द्रव्यकर्मों का कर्तृत्व, पुद्गल में ही ठहरता है । आत्मा में द्रव्यकर्मों का कर्तृव्व व्यवस्थित नहीं हो पाता 122 द्विप्रदेशी आदि पुद्गल परमाणुओं के स्कन्ध, स्निग्ध-रुक्ष-गुणों की परिणमन-शक्ति के अनुसार, स्वतः ही उत्पन्न होते हैं । 'सूक्ष्म' और 'स्थूल' जाति पृथ्वी - जल-अग्नि वायुकायिक भी, स्निग्ध- रुक्ष भावों के परिणामों से, पुद्गल स्कन्ध पर्यायों में उत्पन्न होते हैं । इन परिणमनों में आत्मा / जीव की आवश्यकता रंचमात्र भी अपेक्षित नहीं होती । 23 अनादिबन्ध के योग से जीव अशुद्ध भाव में परिणमन करता है । इस अशुद्ध-परिणाम के बहिरंग / बाह्य-बन्धरूप निमित्त कारण को प्राप्त करके कर्म वर्गणाएँ, अपनी ही अन्तरंग शक्ति के बल पर आठ कर्मों के रूप में परिणमित होती हैं। चूँकि ये कर्मवगंणाएँ, स्वतः ही परिणमनशील हैं। इस लिए, इनके परिणामों का कर्ता भी आत्मा नहीं होता । हुईं हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि लोक के हरएक प्रदेश / स्थान में जीवों की सत्ता है और सवत्र ही कर्मबन्ध के योग्य पुद्गल वर्गणाएँ भी विद्यमान हैं । इसलिए जीव, जहाँ भी जिस रूप में परिणमन करता है, वहाँ, वैसी ही कर्मवर्गणाएँ, उसके परिणामानुसार बन्ध जाती हैं। इस स्थिति से स्पष्ट है कि आत्मा, कर्मवणाओं को बंधने के लिए प्रेरित तक नहीं करता। क्योंकि, जीव जहाँ है, वहाँ अनन्त कर्मवर्गणाएँ भी हैं । अतः उन दोनों का पारम्परिक बन्ध, स्वतः ही वहाँ हो जाता है । इसलिए, आत्मा, न तो पुद्गल पिण्ड रूप कार्माणवर्गणाओं का कर्ता ठहरता है, न ही उनका वह प्रेरक होता है | 24 कथञ्चित् भोक्तृत्व Jain Education International व्यावहारिक दृष्टि से आत्मा को सुख-दुःख रूप पुद्गल कर्मफलों का भोक्ता माना जाता है । निश्चयदृष्टि से तो चेतन भाव का ही वह भोक्ता ठहरता है । 25 जो आत्मा, स्व-शुद्ध-आत्मज्ञान से प्राप्त होने वाले पारमार्थिक-सुखामृतरस का भी भोग नहीं करता है, वही आत्मा, उपचरित असद्भूत व्यवहार दृष्टि की अपेक्षा से, पंचेन्द्रिय विषयों से उत्पन्न इच्छित / अनिच्छित सुख-दुःखों का भोक्ता होता है । इसी तरह, अनुपचरित -असद्भूत व्यवहारदृष्टि की अपेक्षा से अनन्त सुख-दुःखों के उत्पादक द्रव्यकर्मरूप साता - अमाता उदय को भोगता है । यही आत्मा, अशुद्ध-निश्चयदृष्टि की अपेक्षा से हर्ष - विषाद रूप सुख-दुःख का भी भोक्ता है। जबकि शुद्ध निश्चय दृष्टि की अपेक्षा से, परमात्मस्वभाव के परिचायक सम्यक् श्रद्धान- ज्ञान आचरण का, और इनसे उत्पन्न अविनाशी -आनन्द-लक्षण वाले सुखामृत का भोक्ता है । स्वदेह प्रमाणता आहार, भय, मैथुन, परिग्रह - प्रभृति समस्त राग आदि विभाव, देह में ममत्व के कारण हैं । इनमें 'लोक' में सर्वत्र अंनतानंत कर्मवर्गणाएँ भरी आसक्ति होने के कारण और निश्चयदृष्टि से स्व तृतीय खण्ड : धर्म तथा दर्शन साध्वीरत्न कुसुमवती अभिनन्दन ग्रन्थ For Private & Personal Use Only १८६ www.jainelibrary.org
SR No.210719
Book TitleJain Darshan Sammat Atma ka Swarup Vivechan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorM P Patairiya
PublisherZ_Kusumvati_Sadhvi_Abhinandan_Granth_012032.pdf
Publication Year1990
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Soul
File Size2 MB
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