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________________ मुनि श्रीपुण्यविजय : जैनागमधर और प्राकृत वाङ्मय : १६ में प्रथम अध्ययन की केवल ५७ नियुक्ति गाथाएं हैं जब कि हरिभद्र की वृत्ति में १५७ हैं. इससे यह भी सिद्ध होता है कि द्वितीय भद्रबाहु ने नियुक्तियों का अन्तिम संग्रह किया. उसके बाद भी उसमें वृद्धि होती रही है. इस स्पष्टीकरण के प्रकाश में यदि हम श्रुतकेवली भद्रबाहु को भी नियुक्तिकार मानें तो अनुचित न होगा. (७) श्यामाचार्य : (वीर नि० ३७६ में दिवंगतः)-इन्होंने प्रज्ञापना उपांगसूत्र की रचना की है. प्रज्ञापनासूत्र के "वायगवरवंसाओ तेवीसइमेण धीरपुरिसेण' इस प्रारंभिक उल्लेख के अनुसार ये वाचकवंश के २३ वें पुरुष थे. (८,६,१०) आर्य सुहस्ति (वी. नि. २६1) आर्यसमुद्र : (वी. नि. ४७०) और आर्य मंगु (वी. नि. ४७०)-इन तीन स्थविरों की कोई खास कृति हमारे सामने नहीं है, किन्तु जैन आगमों में, खासकर नियुक्ति, भाष्य, चूणि आदि में नाम-स्थापना आदि निक्षेप द्वारा पदार्थमात्र का जो समग्रभाव से प्रज्ञापन किया जाता है इसमें जो द्रव्य-निक्षेप आता है इस विषय में इन तीन स्थविरों की मान्यता का उल्लेख्न कल्पचूर्णि में किया गया है :"किंच श्रादेसा जहा-अज्जमंगू तिविहं संखं इच्छति, एगभवियं बद्धाउयं अभिमुहनाम-गोत्तं च. अज्जसमुद्दा दुविहं, बद्धाउयं अभिमुहनाम-गोत्तं च. अज्जसुहत्थी एग अभिमुहणाम-गोयं इच्छति" ये तीन महापुरुष जैन आगमों के श्रेष्ठ ज्ञाता एवं माननीय स्थविर थे. (११) पादलिप्ताचार्य : (वीर नि. ४६७ के आसपास)-इन आचार्य ने तरंगवई नामक प्राकृत-देशी भाषामयी अति रसपूर्ण आख्यायिका की रचना की है. यह आख्यायिका आज प्राप्त नहीं है किन्तु हारिजगच्छीय आचार्य यश (?) रचित प्राकृत गाथाबद्ध इसका संक्षेप प्राप्त है. डा० अर्क्स लॉयमान ने इस संक्षेप में समाविष्ट कथांश को पढ़कर इसका जर्मन में अनुवाद किया है. यही इस आख्यायिका की मधुरता की प्रतीति है. दाक्षिण्यक उद्योतनसूरि, महाकवि धनपाल आदि ने इस रचना की मार्मिक स्तुति की है. इन्हीं आचार्य ने ज्योतिष्करंडकशास्त्र की प्राकृत टिप्पनक रूप छोटी सी वृत्ति लिखी है. इसका उल्लेख आचार्य मलयगिरि ने अपनी सूर्यप्रज्ञप्तिवृत्ति में (पत्र ७२ व १००) और ज्योतिष्करंडकवृत्ति में (पत्र ५२, १२१,२३७) किया है. यद्यपि आचार्य मलयगिरि ने ज्योतिष्करंडक-वृत्ति को पादलिप्ताचार्यनिर्मित बतलाया है किन्तु आज जैसलमेर और खंभात में पंद्रहवीं शती में लिखी गई मूल और वृत्ति सहित मूल की जो हस्तप्रतियाँ प्राप्त हैं उन्हें देखते हुए आचार्य मलयगिरि के कथन को कहाँ तक माना जाय, यह मैं तज्ज्ञ विद्वानों पर छोड़ देता हूँ. उपर्युक्त मूल ग्रन्थ एवं मूल ग्रन्थसहित वृत्ति के अंत में जो उल्लेख हैं वे क्रमशः इस प्रकार हैं : कालण्णाणसमासो पुवायरिएहि वण्णिओ एसो। दिणकरपण्ण तीतो सिस्सजणहिओ सुहोपायो ।। पुवायरियकयाणं करणाणं जोतिसम्मि समयम्मि । पालित्तकेण इणमो रइया गाहाहिं परिवाडी ॥ -ज्योतिष्करण्डक प्रान्त भाग. कालण्णाणसमासो पुवायरिएहि नीणिओ एसो। दिणकरपण्णत्तीतो सिस्सजणहिओ पिओ ......।। पुवायरियकयाय नीतिसमसमएणं । पालित्तएण इणमो रइया गाहाहिं परिवाडी ।। ।। णमो अरहंताण ॥ कालण्णाणस्सिणमो वित्ती णामेण चंद [....] त्ति । सिवनंदिवायगेहिं तु रोयिगा जिणदेवगतिहेतूणं (?) ।। ॥ ग्रं० १५८० ॥ -ज्योतिष्करंडकवृत्ति प्रान्त भाग. इन दोनों उल्लेखों से तो ऐसा प्रतीत होता है कि-मूल ज्योतिष्करंडकप्रकीर्णक के प्रणेता पादलिप्ताचार्य हैं और उसकी वृत्ति, जिसका नाम 'चन्द्र' है, शिवनन्दी वाचक की रचना है. आचार्य मलयगिरि ने तो सूर्यप्रज्ञप्तिवृत्ति एवं ज्योतिष्करंडक HINITION YAMAMMenimammHOCITYANATYAYANTI HIWANDIIND KADAMITRAULARISM D Jain Educati
SR No.210570
Book TitleJain Agamdhar aur Prakrit Vangamaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay
PublisherZ_Hajarimalmuni_Smruti_Granth_012040.pdf
Publication Year1965
Total Pages30
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size4 MB
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