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________________ ७३४ : मुनि श्रीहजारीमल स्मृति ग्रन्थ : चतुर्थ अध्याय पताका यापनीय 'आचार्यप्रणीत आराधना भगवती' का अनुकरण करके रची गई है. नंदीसूत्र में 'आउरपच्चक्खाण' का जो नाम आता है वह आज के 'आउरपच्चक्खाण से अलग है. सामान्यतः वीरभद्राचार्य को भगवान् महावीर का शिष्य मानते हैं परन्तु उपरोक्त प्रमाण को पढ़ने के बाद यह मान्यता भ्रान्त सिद्ध होती है. इस प्रकार दूसरे आगम भी अलग-अलग समय में रचे हुए हैं. हो सकता है कि रायपसेणीय सूत्र भगवान् महावीर के समय ही में रचा गया हो. नंदी-पाक्षिक सूत्रों के अनुसार आगमों के चौरासी नामों व आज के प्रचलित आगमों के नामों से विद्वान् परिचित हैं ही अत: उनका उल्लेख न करके मैं मुद्दे की बात कह देता हूं कि आज अंगसूत्रों में जो प्रश्नव्याकरणसूत्र है वह मौलिक नहीं किन्तु तत्स्थानापन्न कोई नया ही सूत्र है. इस बात का पता नंदीसूत्र व समवायांग के आगम-परिचय से लगता है. आचार्य श्री मुनिचंद्रसूरि ने देवेन्द्र-नरकेन्द्र प्रकरण की अपनी वृत्ति में राजप्रश्नीय सूत्र का नाम 'राजप्रसेनजित्' लिखा है जो नंदी-पाक्षिक सूत्र में दिये हुए ‘रायप्पसेणइयं' इस प्राकृत नाम से संगति बैठाने के लिए है. वैसे राजप्रश्नीय में प्रदेशिराजा का चरित्र है. इस आगम को पढ़ते हुए पेतवत्थु नामक बौद्धग्रंथ का स्मरण हो आता हैं. प्रकीर्णक—सामान्यतया प्रकीर्णक दस माने जाते हैं किन्तु इनकी कोई निश्चित नामावली न होने के कारण ये नाम कई प्रकार से गिनाये जाते हैं. इन सब प्रकारों में से संग्रह किया जाय तो कुल बाईस नाम प्राप्त होते हैं जो इस प्रकार हैं--- १. चउसरण, २. आउरपच्चक्खाण, ३. भत्तपरिणा, ४. संथारय, ५. तंदुलवेयालिय, ६. चंदावेज्झय. ७. देविदत्थय, ८. गणिविज्जा, ६. महापच्चक्खाण, १०. वीरत्थय, ११. इसिभासियाई, १२. अजीवकप्प, १३. गच्छायार, १४. मरणसमाधि, १५. तित्थोगालि, १६. आराहणपडागा, १७. दीवसागरपण्णत्ति, १८. जोइसकरंडय, १६. अंगविज्जा, २०. सिद्धपाहुड, २१. सारावली, २२. जीवविभत्ति. इन प्रकीर्णकों के नामों में से नंदी-पाक्षिकसूत्र में उत्कालिक सूत्रविभाग में देविदत्थय, तंदुलवेयालिय, चंदावेज्झय, गणिविज्जा, मरणविभत्ति-मरणसमाहि, आउरपच्चक्खाण, महापच्चखाण ये सात नाम और कालिक विभाग में इसिभासियाइं, दीवसागरपण्णत्ति ये दो नाम इस प्रकार ( नाम पाये जाते हैं. फिर भी चउसरण, आज का आउरपच्चक्खाण, भत्तपरिण्णा, संथारय और आराहणपडागा-इन प्रकीर्णकों को छोड़कर दूसरे प्रकीर्णक बहुत प्राचीन हैं, जिनका उल्लेख चूणिकारों ने अपनी चूणियों में किया है. तंदुलवेयालिय का उल्लेख अगस्त्यचूर्णि (पत्र ३) में है. जैसे कर्मप्रकृति शास्त्र का कमप्पगडीसंगहणी नाम कहा जाता है, इसी प्रकार दीवसागरपण्णत्ति का दीवसागरपण्णत्तिसंग्रहणी यह नाम संभावित है. श्वेतांबर मूर्तिपूजक वर्ग तित्थोगालिपइण्णय को प्रकीर्णकों की गिनती में शामिल करता है, किन्तु इस प्रकीर्णक में ऐसी बहुत-सी बाते हैं जो श्वेताम्बरों को स्वप्न में भी मान्य नहीं हैं और अनुभव से देखा जाय तो उसमें आगमों के नष्ट होने का जो क्रम दिया है वह संगत भी नहीं है. अंगविज्जापइण्णय एक फलादेश का ६००० श्लोक परिमित महत्त्व का ग्रंथ है. इसमें ग्रह-नक्षत्रादि या रेखादि लक्षणों के आधार पर फलादेश का विचार नहीं किया गया है, किन्तु मानव की अनेकविध चेष्टाओं एवं क्रियाओं के आधार पर फलादेश दिया गया है. एक तरह माना जाय तो मानसशास्त्र एवं अंगशास्त्र को लक्ष्य में रखकर इस ग्रंथ की रचना की गई है. भारतीय वाङ्मय में इस विषय का ऐसा एवं इतना महाकाय ग्रंथ दूसरा कोई भी उपलब्ध नहीं हुआ है. आगमों की व्याख्या ऊपर जिन जैन मूल आगमसूत्रों का संक्षेप में परिचय दिया गया है उनके ऊपर प्राकृत भाषा में अनेक प्रकार की व्याख्याएँ लिखी गई हैं. इनके नाम क्रमशः—नियुक्ति, संग्रहणी, भाष्य, महाभाष्य ; ये गाथाबद्ध-पद्यबद्ध व्याख्याग्रंथ हैं. और चूणि, विशेष चूणि एवं प्राचीन वृत्तियाँ गद्यबद्ध व्याख्याग्रंथ हैं. KIMANTHATITIHAANDALIMALANILEPHATIONyimmHARATI Pory RLIA' S0 UMAMES Tara Jain . m aithivary.org
SR No.210570
Book TitleJain Agamdhar aur Prakrit Vangamaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay
PublisherZ_Hajarimalmuni_Smruti_Granth_012040.pdf
Publication Year1965
Total Pages30
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size4 MB
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