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________________ मुनि श्रीपुण्यविजय : जैन आगमधर और प्राकृत वाङ्मय : ७३१ नूतनफलकम्. ततोऽपरमपि शतकविवरणनामकम्, अन्यदप्यनुयोगद्वारवृत्तिसंज्ञितम्, ततोऽपरमप्युपदेशमालासूत्रा-भिधानम्, अपरं तु तद्वृत्तिनामकम्, अन्यच्च जीवसमासविवरणनामधेयम्, अन्यत्तु भवभावनासूत्रसंज्ञितम् अपरं तु तद्विवरणनामकम्, अन्यच्च झटिति विरचय्य तस्याः सद्भावनामञ्जूषाया अङ्गभूतं निवेशितं नन्दिटिप्पनकनामधेयं नुतनं फलक. एतैश्च नूतनफलकनिवेशितर्वज्रमयीव सञ्जातासौ मञ्जूषा तेषां पापानामगम्या. ततस्तैरतीवच्छलघातितया सञ्चूर्णयितुमारब्धं तद्वार-कपाटसम्पुटम्. ततो मया ससम्भ्रमेण निपुणं तत्प्रतिविधानोपायं चिन्तयित्वा विरचयितुमारब्धं तद्वारपिधानहेतोविशेषावश्यकविवरणाभिधानं वज्रमयमिव नूतनकपाटसम्पुटम्. ततश्चाभयकुमारगणि-धनदेवगणि-जिनभद्गणिलचमणगणि-विबुधचन्द्रादिमुनिवृन्द-श्रीमहानन्द -श्रीमहत्तरा-वीरमतीगणिन्यादिसाहाय्याद् रे रे ! निश्चितमिदानी हता वयं यद्य तन्निष्पद्यते, ततो धावत धावत गृहीत गृह्णीत लगत लगत' इत्यादि पूत्कुर्वतां सर्वात्मशक्त्या प्रहरतां हाहारवं कुर्वतां च मोहादिचरटानां चिरात् कथं कथमपि विरचय्य तद्द्वारे निवेशितमेतदिति." [पत्र १३५६] इस उल्लेख में आपने नन्दिटिप्पनक रचना का उल्लेख किया है जो आज प्राप्त नहीं है. साथ में यह भी एक बात है कि—इन्हीं के शिष्य श्री श्री चन्द्र सूरि ने प्राकृत मुनिसुव्रतस्वामिचरित्र के अन्त में श्री हेमचन्द्र सूरि का जीवनचरित्र दिया है जिसमें इनकी ग्रन्थरचनाओं का भी उल्लेख किया है किन्तु उसमें नन्दीसूत्रटिप्पनक के नाम का निर्देश नहीं है, यह आश्चर्य की बात है. मुनिसुव्रतस्वामिचरित्र का उल्लेख इस प्रकार है. जे तेण सयं रइया गंथा ते संपइ कहेमि ॥४१।। सुत्तमुवएसमाला-भवभावणपगरणाणि काऊणं । गंथसहस्सा चउदस तेरस वित्ती कया जेण ।।४२।। अणुअोगद्दागणं जीवसमासस्स तह य सयगस्स । जेणं छ सत्त चउरो गंथसहस्सा कया वित्ती ॥४२।। मूलावत्सयवित्तीए उवरि रइयं च टिप्पणं जेण । पंच सहस्सपमाणं विसमठाणावबोधयरं ॥४४।। जेण विसेसावस्सयसुत्तस्सुवरि सवित्थरा वित्ती । रइया परिप्फुडत्था अडवीस सहस्सपरिमाणा ।।४।। वक्खाणगुणपसिद्धि सोऊणं जस्स गुज्जर नरिंदो । जयसिंहदेवनामो कयगुणिजणमणचमक्कारो ॥४६॥ इस उल्लेख में श्रीहेमचन्द्र सूरि रचित सब ग्रन्थों के नाम और उनका ग्रन्थप्रमाण भी उल्लिखित है. सिर्फ इसमें नन्दीसूत्रटिप्पनक का नाम शामिल नहीं है. संभावना की जाती है कि इस चरित की प्रारम्भिक नकल करने के समय प्राचीन काल से ही ४४ गाथा के बाद की एक गाथा छूट गई है. अस्तु, कुछ भी हो, श्रीहेमचन्द्रसूरि महाराज ने आप ही अपनी विशेषावश्यकवृत्ति के अन्त में "अन्यच्च झटिति विरचय्य तस्या: सद्भावनामञ्जूषाया अङ्गभूतं निवेशितं नन्दिटिप्पनकनामधेयं फलकम्" ऐसा उल्लेख किया है, इससे यह बात तो निविवाद है कि--आपने नन्दिटिप्पनक की रचना अवश्य की थी, जो आज प्राप्त नहीं है. आज जो नन्दिटिप्पनक प्राप्त है वह शीलभद्रसूरि एवं धनेश्वरसूरि इन दो गुरु के शिष्य श्रीचन्द्रसूरि का रचित है जो प्राकृत टेक्स्ट सोसायटी की ओर से छप कर प्रकशित होगा. (४७) प्राचार्य मलयगिरि (वि० १२-१३ श०)-इनके गुरु, गच्छ आदि के नाम का कोई पता नहीं लगता. ये गूर्जरेश्वर चौलुक्यराज जयसिंहदेव के माननीय और महाराजा कुमारपालदेव के धर्मगुरु श्रीहेमचन्द्राचार्य के विद्या-आराधना के सहचारी थे. आचार्य हेमचन्द्र के साथ इनका सम्बन्ध अति गहरे पूज्य भाव का था. इसलिए इन्होंने अपनी आवश्यकवृत्ति में आचार्य हेमचन्द्र की द्वात्रिंशिका का उद्धरण देते हुए “आह च स्तुतिषु गुरवः' इस प्रकार उनके लिए अत्यादरगभित शब्दप्रयोग किया है. इन्होंने नन्दीसूत्र, भगवती-द्वितीयशतक, राजप्रश्नीय, प्रज्ञापना, जीवाभिगम, सूर्यप्रज्ञप्ति, चन्द्रप्रज्ञप्ति, व्यवहारसूत्र, बृहत्कल्प, आवश्यक, पिण्डनियुक्ति एवं ज्योतिष्करण्डक-इन जैन-आगमों पर सपादलक्ष श्लोक - SAN •io 491CED HLA RRTRONTRYeave KAREAD HARIHARA KEISSENARIESENISENBLENESENNOSENENINONE, PATH
SR No.210570
Book TitleJain Agamdhar aur Prakrit Vangamaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay
PublisherZ_Hajarimalmuni_Smruti_Granth_012040.pdf
Publication Year1965
Total Pages30
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size4 MB
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