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________________ पंचम खण्ड : ६५९ विकारका निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध तो है, किन्तु कर्ता-कर्म सम्बन्ध बिलकूल नहीं है। विकार उत्पन्न, नाश होता है, अतः वह विकारी पर्याय है। द्रव्य स्वभावमें रागादिका भी प्रवेश नहीं, तब कर्मादिका प्रवेश तो असम्भव ही है । क्योंकि सभी द्रव्य अपने-अपने चतुष्टयको छोड़कर परद्रव्यमें प्रवेश नहीं करते हैं । अपने ही चतुष्टयमें रहते हैं। कर्म विकार भी नहीं कराता है, जीव अपनी कमजोरीसे स्वयं कर्मादिके उदयानुसार पर पदार्थोंमें तन्मय होकर विकार करता है। कर्म घुमाता है, यह उपचार कथन है। यदि घुमाता हो तो कोई जीव संसारसे छूट ही नहीं सकता है । संसार भ्रमण और सुख-दुःखका मूल कारण तो अज्ञानता है । कहा भी है"मैं भ्रम्यो अपनपो विसरि आप, अपनाये बहुविध पुण्य पाप ।' शंका १०-जीव तथा पुद्गलका एवं द्वयणक आदि स्कन्धोंका बंध वास्तविक है या अवास्तविक ? यदि अवास्तविक है, तो केवली उसे जानते हैं या नहीं? ... समाधान-प्रश्नोत्तर ९ की तरह जोव और पुद्गलका या स्कंधोंका व्यवहारसे बंध कहा जाता है। निश्चयदृष्टिसे प्रत्येक द्रव्य व प्रत्येक परमाणु अपने द्रव्य स्वभावको कभी नहीं छोड़ता है । अतः स्वतंत्र एवं अबंध स्वरूप ही है । एक द्रव्य दूसरे द्रव्य, एक गुण दूसरे गुण रूप परिणमन नहीं करता अतः द्रव्यस्वभाव अबंध स्वरूप ही है। शंका ११-परिणमनमें स्वप्रत्यय और स्वपर प्रत्यय दो भेद हैं, उनमें वास्तविक अन्तर क्या है ? समाधान-समस्त द्रव्योंकी अगुरुलघु गुण षड्गुण हानि वृद्धि परिणमनस्वभाव पर्याय या स्वप्रत्यय है, पर निमित्त पूर्वक जो पर्याय होती है; वह स्वपर प्रत्यय परिणमन है । पर निमित्तकी उपस्थितिमें होनेवाली पर्यायको स्वपर प्रत्यय परिणमन कहते हैं। परिणमनको पर प्रत्यय कहना उपचार कथन है। क्योंकि अन्यत्र प्रसिद्ध धर्मका अन्यत्र समारोप करना, असद्भूत व्यवहारनय या उपचार है । __ शंका १२--कुगुरु, कुदेव, कुशास्त्रकी श्रद्धाके समान सुदेव, सुशास्त्र और सुगुरुकी श्रद्धा भी मिथ्यात्व है, क्या ऐसा मानना या कहना शास्त्रोक्त है ? समाधान-कुगुरु आदि श्रद्धान गृहीत मिथ्यात्व है और सुगुरु आदि श्रद्धान व्यवहार सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दृष्टिके सच्चे देव, शास्त्र, गुरुकी श्रद्धा होती ही है । शंका १३-पुण्यका फल जब अरहंत तक होना कहा गया है जिससे यह आत्मा तीन लोकका से सर्वातिशायी पुण्य बतलाया है ।ऐसे पुण्यको हीनोपमा देकर त्याज्य कहना और मानना क्या शास्त्रोक्त है ? समाधान-उपदेश प्रयोजन और आवश्यक हितकी दृष्टिसे दिया जाता है । जहाँ मोक्षमार्ग और सम्यग्दर्शन प्राप्त करनेके लिए सात तत्त्वोंका यथार्थ श्रद्धान करनेका उपदेश है, वहाँ सभी प्रकारके पुण्यको आस्रवमें ही गिनाया है । तथा आस्रवसे बंध और बंधसे संसार होता है, ऐसा जिनागममें कहा गया है । किन्तु नरकादि अधोगतिके कारण पापसे बचनेके लिए पुण्य करनेका उपदेश भी जिनागममें बहुलतासे दिया गया है । आस्रव तत्त्वको आस्रव स्वीकार करना, यही उपदेश तो दिया गया है। उसको संवर, निर्जरा तत्त्व या मोक्षमार्ग मत मातो, इसी मान्यताको छुड़ानेका नाम हेय है। पुण्य नहीं छुड़ाया है, उसको धर्म माननेकी गलत मान्यता छुड़ाई है । कोई भी पुण्य हो, वह आस्रव तत्त्व है। आस्रव तत्त्व राग भाव होने से उसे राग भाव ही मानो, वीतराग भाव मत मानो । तत्त्वनिर्णय कराने के लिए जिनागममें ऐसा ही उपदेश है। पुण्यको जहाँ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210514
Book TitleJaipur Tattvacharcha Ek Samiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPrakash Hitaishi
PublisherZ_Fulchandra_Shastri_Abhinandan_Granth_012004.pdf
Publication Year
Total Pages18
LanguageHindi
ClassificationArticle & Criticism
File Size2 MB
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