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________________ ५०६ (११) समता, शान्ति और समर्पण इन तीनों को साधक जितना अधिक अपने जीवन में उतारेगा उतनी ही अधिक प्रगति होगी। (१२) अपने सभी सम्बन्धों में आध्यात्मिकता स्थापित करनी चाहिये। (१३) अयोग्य आकर्षणों की ओर झुकाव नहीं होना चाहिए। (१४) किसी को भी किसी प्रकार के राग द्वेष में नहीं बाँधना चाहिये। (१५) साधना के परिणाम के लिए अधीर नहीं होना चाहिये। (१६) यह विश्वास रखना चाहिये कि साधना में बीते प्रत्येक पल का जीवन पर अचूक असर होता है। (१७) नवकार सूक्ष्म भूमिकाओं में अप्रगट रूप से शुद्धि का कार्य करता है चाहे तात्कालिक प्रभाव नहीं मालुम हो परन्तु धीरे- दीरे योग्य समय पर अपनी समग्रता में तथा अपने वातावरण में उसके प्रभाव का प्रगट रूप में अनुभव होता है। (१८) जब तक साधक के चित्त में चंचलता, अस्थिरता, अश्रद्धा, चिन्ता आदि होते हैं तब तक वह प्रगति नहीं कर सकता। (१९) जप साधना के लिए शान्ति, स्थिरता, अडिगता चाहिये। (२०) साधक को गुणों का चिन्तन मनन करना चाहिये और स्वयं गुणी होना चाहिये । (२१) साधक को श्रद्धा होनी चाहिये कि उद्देश्य की सफलता इस जप के प्रभाव से ही होने वाली है तथा जैसे-जैसे सफलता मिलती जाये उसमें समर्पण भाव अधिक होना चाहिये। (२२) जप की संख्या के ध्यान के साथ जप से चित्त में कितनी एकाग्रता हुई इसका ध्यान रखना चाहिये। (२३) एकाग्रता लाने के लिये भाव विशुद्धि बढ़ाना चाहिये। (२४) जप से मन की शुद्धि होती है जिसके फल में बुद्धि निर्मल बनी रहती है ऐसा विचार रखना चाहिये। (२५) जप करने वाले को विषयों को विष वृक्ष के समान, संसार संयोगों को स्वप्न के समान समझना; अनित्यादि भावना व उसके मर्म को समझने का चिन्तवन करना चाहिये। (२६) जप करने वालों को श्रद्धा रखनी चाहिये कि जप से शुभ कर्म का आम्रव, अशुभ का संवर, पूर्व कर्म की निर्जरा, लोक स्वरूप का ज्ञान, सुलभ बोधिपना तथा सर्वज्ञ कथित धर्म की भवोभव प्राप्ति कराने वाला पुण्यानुबंधि पुण्य कर्म का उपार्जन होता है। आदि...... जप करने वालों को कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक है - (१) दुर्व्यसनों का त्याग, (२) अभक्ष्य भक्षण का त्याग, (३) उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि स्मृति ग्रन्थ श्रावकाचार का पालन, (४) जीवन में प्रामाणिकता, (५) स्वधर्मी के प्रति वात्सल्य, (६) जप का निश्चित समय, (७) निश्चित आसन, (८) निश्चित दिशा, (९) निश्चित माला या प्रकार, (१०) निश्चित संख्या, (११) पवित्र एकान्त स्थान, (१२) स्थान को शुद्ध व पवित्र करना, (१३) सात्विक भोजन आदि । महर्षियों ने जप के लिए कई मंत्र भिन्न-भिन्न आशयों के लिये बनाये हैं। मंत्र साधन है। अच्छे मंत्रों का श्रद्धापूर्वक लयबद्ध, शुद्ध, आत्मनिष्ठा, संकल्प शक्ति के समन्वय के साथ किया गया जप अत्यन्त शक्तिशाली हो जाता है। मंत्र के निरन्तर जप से होने वाले कम्पन अपने स्वरूप के साथ ध्वनि तरंगों पर आरोहित होकर पलक झपकें इतने समय में समस्त भू-मण्डल में ही नहीं अपितु १४ राजूलोक में अपना उद्देश्य प्रसारित कर देते हैं। जप के शब्दों की पुनरावृत्ति होते रहने से उच्चारित किये गये शब्दों की स्पन्दित तरंगों का एक चक्र (सर्किट) बनता है। जिस प्रकार इलेक्ट्रो मेग्नेटिक तरंगों की शक्ति से अन्तरिक्ष में भेजे गये राकेट को पृथ्वी पर से ही नियंत्रित कर सकते हैं, लेसर किरणों की शक्ति से मोटी लोहे की चहरों में छेद कर सकते हैं, उसी प्रकार मंत्रों के जप की तरंगों से मंत्र योजकों द्वारा बताये गये कार्य हो सकते हैं। जप क्रिया में साधक को तथा वातावरण को प्रभावित करने की दोहरी शक्ति है। जप करने वाला मन के निग्रह से सारे विश्व के प्राण मण्डल में स्पन्दन का प्रसार कर देता है। मन एक प्रेषक यंत्र की तरह कार्य करता है। मन रूपी प्रेषक यंत्र (Transmitter) से प्राण रूपी विद्युत द्वारा विश्व के प्राण मण्डल में स्पन्दन फैलाया जाता है, जो उन जीवों के मन रूपी यंत्रों (Receiver) पर आघात करते हैं जिनमें जप करने वाले योगी कोई भावना जगाना चाहते हैं। क्योंकि वाणी का मन से, मन का अपने व्यक्तिगत प्राण से और अपने प्राण का विश्व के प्राण से उत्तरोत्तर सम्बन्ध है। साधारण रूप में प्रत्येक शब्द चाहे किसी भाषा का हो, मंत्र है। अक्षर अथवा अक्षर के समूहात्मक शब्दों में अपरिमित शक्ति निहित है। मंत्रों से वांछित फल प्राप्त करने के लिए मंत्र योजक की योग्यता, मंत्र योजक की शक्ति, मंत्र के बाच्य पदार्थों की शक्ति, उन वाच्य पदार्थों से होने वाले शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, सौर मण्डलीय शक्ति का प्रभाव तो है ही, साथ ही जप करने वाले की शक्ति, आत्म स्थित भाव, अखण्ड विश्वास, निश्चल श्रद्धा, आत्मिक तेज, मंत्र की शुद्धि, मंत्र की सिद्धि आदि का विचार भी आवश्यक है। जप का मूल साधन ध्वनि है। भारतीय ध्वनि शास्त्र में स्नायविक और मानसिक चर्चा के आधार स्वरूप ध्वनि के चार स्तर है- ( १ ) परा, (२) पश्यन्ती, (३) मध्यमा, (४) वैखरी । (१) परा परा बाक् मूलाधार स्थित पवन की सरकारीभूता होने के कारण एक प्रकार से व्यक्त ध्वनि की मूल उत्स शक्ति की
SR No.210509
Book TitleJapyog Sadhana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVimalkumar Choradiya
PublisherZ_Nahta_Bandhu_Abhinandan_Granth_012007.pdf
Publication Year
Total Pages3
LanguageHindi
ClassificationArticle & Mantra Tantra
File Size3 MB
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