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________________ [ १०७ १ भूलेश्वर:- कुंभार टुकडा के चितामणी पार्श्वनाथ देहरासर की प्रतिष्ठा सं० २०६८ के दूसरे वैशाख सुद शुक्रवार के दिन सेठ नेमचन्द भाई ने कराई और उसके लिये रु० ५००००/- दिये । भींडो बाजार : शान्तिनाथ महाराज के देहरासर की प्रतिष्ठा सं० २०७६ माह सुद १३ के रोज हुई, उसके लिये रु० ४००००/- दिये । कोट बोरा बाजार : शान्तिनाथ महाराज के देहरा सर की प्रतिष्ठा सं० १०६५ माह बद ५ के दिन हुई उनकी प्रतिष्ठा के लिये और देहरासर के निर्माण हेतु उनके कुटुम्ब ने दो लाख रुपये खर्च किये। सेठ अमोचन्द जिस जगह । रहते थे और जिसके पास शान्तिनाथजी का मन्दिर है वह वास्तव में उपाधय था जिसे उनके बड़े भाई नेमचन्द ने तोन हजार रुपये खर्च कर बनवाया था। पीछे और जगह लेकर वहाँ नेमचन्दभाई ने एक लाख और खर्च कर मन्दिर बनवाया । प्रतिष्ठा और निर्माण में कुल दो लाख खर्च हुए । मदरास की दादावाड़ी की जमीन खरीदने और निर्माण हेतु रु० ५००००/- सं० १८८४ में दिया । पालीवाना की धर्मशाला के निर्माण में रु० ६,०००/- खर्च हुए। : भायखला की दादाबाड़ी मन्दिर को जमीन निर्माण व प्रतिष्ठा में० (सं० १८८५ मगसर सुद ६) दो ला रुपये खर्च किये । बम्बई गोड़ीजी के मन्दिर की प्रतिष्ठा सं० १८६८ के वैसाख सुद १० के दिन हुई जिसमें पचास हजार रुपये दिये । पायधुनी के आदोश्वरजी के मन्दिर को प्रतिष्ठा सं० १८५२ के ज्येष्ठ सुद १० के दिन हुई । उसको उछा मणि में पचास हजार की बोली बोली । कर्जदारों को छूट अंत समय नजदीक आया जान जिन कई अशक्त लोगों में रुपया लेना था उनको कर्ज मुक्त करने के लिये एक लाख रुपया छोड़ दिया । इन सब का योग २८,०८,००० अट्ठाइस लाख आठ हजार होता है । Jain Education International इस मोटी रकम के अलावा छोटी-छोटी रकमें तो कई थी जिनका कोई हिसाब नहीं बम्बई की कोई कन्या पानडी ऐसी नहीं होती थी जिसमें उनका नाम न होता हो। इस प्रकार की रकम भी कई लाख है । आप प्राय: सब दान सेठ अमोचन्द साकरचन्द के नाम से ही देते थे और इसी में अपना गौरव समझते थे । इनका रहन-सहन बिलकुल साधारण नहीं था। सिर पर सूरती पगडी ओर शरीर पर बालायंधी केडियू लम्बो को वाला पहनते थे। कचलो सं० १८५५ में सेठ मोतीशाह के पिता की मृत्यु के बाद उनकी उत्तरोत्तर उन्नति होती गई। इसके बाद सारे जीवन में धन सम्बन्धी दुःख तो इन्होने देखा नहीं । उनके ग्रह सं० १८८० से तो और भी बलवान हो गये । कुंतासर के तालाब को पूरने के समय से लेकर के अंतिम तक दिनोंदिन बलवान ही होते रहे । मोतीशाह सेठ का अपने मुनीमों के साथ सम्बन्ध कुटुम्बी जनों के समान था उनको यही इच्छा रहती । थी कि उनके मुनीम भी उनके से धनी बने । मुनीमों को अच्छे बुरे अवसरों पर उदारता पूर्वक मदद करते सेठ मोतीशाह के मुनीम लक्षाधिपति हुए हैं, इसके कई उदाहरण मौजूद हैं। उनको ट्रैक में उनके मुनीमों ने मन्दिर बनवाये हैं । उनके यहां अधिक कार्यकर्त्ता जेन थे। इसके अलावा हिन्दू व पारखी भी थे। सेठ मोती शाह का जैन, हिन्दू व पारसी व्यापारियों व कुटुम्बों के साथ भी अच्छा सम्बन्ध था। इनमें सम्बन्धित जनों ने मोतीशाह ट्रंक में हराकर बनायें हिन्दू व पारसो कुटुम्ब भी इनके प्रत्येक कार्य में हर प्रकार की सलाह एवं मदद देने को तैयार रहते थे । जिस समय उनके पुत्र खेमचन्द भाई ने पालीताणा का संघ निकाला तब सर जमशेदजी ने एक लाख रुपया खर्च किया यह उल्लेखनीय एवं महत्वपूर्ण घटना है। इससे ज्ञात होता है कि परस्पर सहकार व सम्बन्ध किस प्रकार हृदय की भावना से निभाया जाता था । यही कारण था कि सेठ की मृत्यु के बाद पालीताणा संघ व प्रतिष्ठा के अवसर पर अनेक लोगों ने सहयोग दिया। उनके पुत्र खेमचन्द भाई तो एक राजा की तरह रहे । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210436
Book TitleKhartargaccha ki Mahan Vibhuti Davnvir Seth Motishah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandmal Sipani
PublisherZ_Manidhari_Jinchandrasuri_Ashtam_Shatabdi_Smruti_Granth_012019.pdf
Publication Year1971
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size4 MB
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