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________________ से कहा जा सकता है कि साधना के रहस्य को समझे बिना कर्म के जिसकी चेतना की परिणति यदि ठगने की होती है तो उस समय रहस्य को नहीं समझा जा सकता और कर्म के रहस्यको समझे बिना ग्रहण किए जाने वाले कर्म-पुद्गल अनुभव दशा में उसके चरित्र साधना के रहस्य को नहीं समझा जा सकता। हम कर्म-पुद्गल की को विकृत बनाते हैं। उसकी परिणति यदि दूसरे को कष्ट देने की जिन धाराओं को ग्रहण करते हैं, उन्हें अपनी क्रियात्मक शक्ति के होती है तो उस समय ग्रहण किए जाने वाले कर्म-पुद्गल अनुभव द्वारा ही ग्रहण करते हैं। उस समय हमारी चेतना की परिणति भी दशा में उसके सुख में बाधा डालते हैं। यह परिणति का सिद्धान्त उसके अनुकूल होती है। आन्तरिक और बाह्य परिणतियों में सामंजस्य है। हम किस रूप में परिणत होते हैं, किस प्रकार की क्रियात्मक हुए बिना दोनों में सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकता। जैन दर्शन ने शक्ति के द्वारा पुद्गल-धारा को स्वीकार करते हैं, इसका ज्ञान होना कर्मवाद की मीमांसा की है, उनका मनोवैज्ञानिक अध्ययन अभी नहीं अत्यन्त आवश्यक है। इसके आधार पर ही वह जीवन की सफलता हुआ है। यदि वह हो तो मनोविज्ञान और योग के नये उन्मेष हमारे का निर्धारण कर सकता है, जीवन-संघर्ष में आनेवाली बाधाओं को सामने आ सकते हैं तथा जैन साधना पद्धति का नया रूप भी प्रस्तुत पार कर सकता है। हो सकता है। हम जैसी भावना करते हैं, वैसी ही हमारी परणति जिस व्यक्ति को यह लगे कि मुझे ज्ञानावरण अधिक सता रहा होती है। जैसी परणति होती है, वैसे ही पुद्गलों को हम ग्रहण करते है, उसको ज्ञानावरण को क्षीण करने की साधना का मार्ग चनना है। उन पुदगलों का अपने आप में परिपाक होता है। परिणाम के बाद चाहिए। किसी को मोह अधिक सताता है, किसी की क्षमताओं का उसकी जो परणति होती है, वह हमारी आन्तरिक परणति हो जाती ____ अवरोध पैदा होता है - ये भिन्न-भिन्न समस्याएं हैं। साधना के द्वारा है। यह एक श्रृंखला है। एक व्यक्ति ने ज्ञान के प्रति अवहेलना का इनका समाधान पाया जा सकता है। क्रोध पर विजय प्राप्त करनी हो भाव प्रदर्शित किया, ज्ञान की निन्दा की, ज्ञानी की निन्दा की, उस तो एक प्रकार की साधना करनी होगी और यदि मान पर चोट करनी समय उसकी परिणति ज्ञान-विमुख हो गई। उस परिणति-काल में वह हो तो दूसरे प्रकार की साधना करनी होगी। जिस समस्या से जूझना कर्म-पुद्गलों को ग्रहण करता है। वे कर्म पुद्गल आत्मा की सारी कम पुद्गल आत्मा का सारा है, उसी के मूल पर प्रहार करने वाली साधना चुननी होगी। यह बहुत शक्तियों को प्रभावित करते हैं। किन्तु ज्ञान-विरोधी परिणति में गृहीत सम पदति है। रहस्य हमारी समझ में आ जाए तो जीवन की पुद्गल मुख्यतया ज्ञान को आवृत्त करेंगे। उनका परिपाक ज्ञानावरण / समस्याओं को सुलझाने में हम बहुत सफल हो सकते हैं। के रूप में होगा। इस प्रकार हम सारे कर्मों की मीमांसा करते चलें। भक्ति करना वैयावच्च तप है। यह तप दस प्रकार के योग्य पात्र की सेवा करना है। (पृष्ठ 38 का शेष) 5. काय क्लेश: - शास्त्रानुसार केश लोच करना, शरीर का ममत्व छोड़ना शरीर सेवा त्याग, आतापना लेना, धर्मध्यान, शुक्ल ध्यान ध्याना। यह तप - निर्वेदका कारण है। संलीनता :- कषाय भावों को रोकना, वर्जित स्थानों में नहीं रहना, इंद्रियों को दमन करना उनके विषयों को जीतना संलीनतातप कहलाता है। 10. स्वाध्याय :- नित्यप्रति धार्मिक शास्त्रों का वाचन, सुनना पढ़ाना, शंका समाधान करना, सूत्र व अर्थ का चिंतन करना, अनुशीलन करना और शास्त्रोपदेश देना यह पांच प्रकार का स्वाध्याय तप है। 11. ध्यान तप :- आर्तध्यान, रौद्रध्यान का त्याग करना आत्मा को धर्म ध्यान, शुक्ल ध्यान का विचार करना, शुध्यान करना ध्यान तप है। 7. प्रायश्चित:- मानव मात्र भूल का पात्र है। की हुई भूल का अवांछनीय कर्म का समर्थ गीतार्थ गुरु के सामने पाप को प्रकट कर उचित दण्ड लेना व मन में पुनः ऐसी भूल न हो ऐसी कोशिश करना प्रायश्चित्त तप कहलाता है। 12. कायोत्सर्ग तप : शरीर की ममता छोड़ अनशन करना, दीक्षा लेना कर्म बंध के हेतुओं को छोड़ना 'कायोत्सर्ग' तप है। विनय तप :- अपने से बड़े, पूज्य आचार्य भगवंत, साधु साध्वी ज्ञानवान तपवान को उचित आदर सन्मान देना विनय तप है, विनय ही धर्म का मूल है। ऐसे केवली प्ररूपित तप धर्म को जो कोई प्राणी अपनाता दूसरे को तप करने को उत्साहित करता है व तप करने वाले की अनुमोदना करता है वह कर्मों की निर्जराकर भविष्य में पुण्यानुबन्धीपुण्य का भी भागीदार होता है। अत: त्रिकरण त्रियोग से तप कराना व अनुमोदनकर जावन का श्रय प्राप्त करना चाहिय। वैयावच्च तप :-गुरु, अपने से बड़े, साधु महाराज, बाल, म्लान रोगी साधु, साधर्मिक, कुल, गण संघ आदि की सेवा श्रीमद जयंतसेनसरि अभिनंदन ग्रंथावाचनाम खुद कुछ कर सकते नहीं, करे उसी पर द्वेष / जयन्तसेन दुर्गुण यह, देत सदा हि क्लेश // www.jainelibrary.org Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only
SR No.210362
Book TitleKarmwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahapragna Acharya
PublisherZ_Jayantsensuri_Abhinandan_Granth_012046.pdf
Publication Year
Total Pages3
LanguageHindi
ClassificationArticle & Philosophy
File Size3 MB
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