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________________ प्रभो! आपको जाना था तो चले जाते, पर इस बालक को पास में तो रखते। मैं अबोध बालक की तरह आपका अंचल / चरण पकड़ कर आपके मार्ग में बाधक नहीं बनता ! मैं आपसे केवलज्ञान की भिक्षा याचना भी नहीं करता। ओ महावीर ! क्या आप भूल गये ? मैं तो आपके प्रति असीम अनुराग के कारण "केवल्य" को भी तुच्छ समझता था ! फिर भी आपने स्नेह भंग कर मेरे हृदय को टूक-टूक कर डाला ! क्या यही आपकी प्रभुता थी ? इस प्रकार गौतम के अणु-अणु में से प्रभु के विरह की वेदना का क्रन्दन उठ रहा था। वे स्वयं को भूलकर, प्रभु के नाम पर ही नि:श्वास भरते हुए अन्तर् वेदना को व्यक्त कर रहे थे। ऐसी दयनीय एवं करुणस्थिति में भी उनके आँसुओं को पोंछने वाला, भग्न हृदय को आश्वासन देनेवाला और गहन शोक के सन्ताप को दूर करनेवाला इस पृथ्वीतल पर आज कोई न था। अनेक आत्माओं का आशा स्तम्भ, अनेक जीवों का उद्धारक और निपुण खिवैया भी आज विषम हताशा के गहन वात्याचक्र में फंस । गया था। विचार परिवर्तन और केवलज्ञान भगवान् महावीर के प्रति गौतम का अगाध / असीम अनुराग ही उनके केवलज्ञान की प्राप्ति में बाधक बन रहा था । किन्तु, उनकी इस भूल को बतलाने वाला वहाँ न कोई तीर्थकर था और न कोई श्रमण या श्रमणी ही इस समय उनके पास उपस्थित थे। इस समय गौतम एकाकी, केवल एकाकी थे। वेदनानुभूति जनित विलाप और उपालम्भात्मक आक्रोश उद्गारों के द्वारा प्रकट हो जाने पर गौतम का मन कुछ शान्त / हलका हुआ । अन्तर कुछ स्थिर और स्वस्थ हुआ सोचने-विचारने और वस्तुस्थिति समझने की शक्ति प्रकट हुई। सोचने की विचारधारा में परिवर्तन आया अन्तर्मुखी होकर गौतम विचार करने लगे "अरे! चार ज्ञान और चौदह पूर्वो का धारक तथा महावीर तीर्थ का संवाहक होकर मैं क्या करने लगा ! मैं अनगार हूँ, क्या मुझे विलाप करना शोभा देता है? करुणासिन्धु, जगदुद्धारक प्रभु को उपालम्भ दू: क्या मेरे लिये उचित है? अरे जगद्वन्द्य प्रभु की कैसी अनिर्वचनीय ममता थी! अरे प्रभु तो असीम स्नेह के सागर थे, क्या वे कभी कठोर बनकर, विश्वास भंग कर छोह दे सकते हैं? कदापि नहीं। अरे! भगवान् ने तो बारम्बार समझाया था- गौतम! प्रत्येक आत्मा स्वयं की साधना के बल पर सिद्धि प्राप्त कर सकती है। दूसरे के बल पर कोई सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता और न कोई किसी जीव की साधना के फल को रोक सकता है। मुझे अभी तक शिक्षा एक यशस्वी दशक Jain Education International कैवल्य प्राप्त नहीं हुआ तो इसमें भगवान् का क्या दोष है ! इसमें भूल या कमी तो मेरी ही होनी चाहिए ।" गौतम का अन्तर - चिन्तन बढ़ने से प्रशस्त विचारों का प्रवाह बहने लगा। वे वीर ! महावीर !! का स्मरण करते-करते प्रभु के वीतरागपन पर विचार मन्थन करने लगे "ओ भगवान् तो निर्मम, नीरागी और वीतराग थे । राग-द्वेष के दोष तो उनका स्पर्श भी नहीं कर पाते थे । ऐसे जगत् के हितकारी वीतराग प्रभु क्या मेरा अहित करने के लिये अन्त समय में मुझे अपने से दूर कर सकते थे ? नहीं, नहीं! प्रभु ने जो कुछ किया मेरे कल्याण के लिये ही किया होगा।" गौतम को स्पष्ट आभास होने लगा - " मेरी यह धारणा ही भ्रमपूर्ण थी कि प्रभु की मेरे ऊपर अपार ममता है। प्रभु के ऊपर ममता, आसक्ति, अनुराग दृष्टि तो मैं ही रखता था । मेरा यह एकपक्षीय था। यह राग दृष्टि ही मेरे केवली बनने में बाधक बन रही थी। द्वेष-बुद्धि या राग-दृष्टि के पूर्ण अभाव में ही आत्म-सिद्धि का अमृततत्त्व प्रकट होता है, विद्यमानता में कदापि नहीं में स्वयं अपनी सिद्धि को रोक रहा था, इसमें भगवान् का क्या दोष है ? मेरी इस राग दृष्टि को दूर करने के लिये ही प्रभु ने अन्त समय में मुझे दूर कर, प्रकाश का मार्ग दिखाकर मुझ पर अनुग्रह किया है। किन्तु, मैं अबूझ इस रहस्य को नहीं समझ सका और प्रभु को ही दोष देने लगा । हे क्षमाश्रमण भगवन्! मेरे इस अपराध / दोष को क्षमा करें। " पश्चाताप, आत्मनिरीक्षण तथा प्रशस्त शुभ अध्यवसायों की अग्नि में गौतम के मोह, माया, ममता के शेष बन्धन क्षणमात्र में भस्मीभूत हो गये । उनकी आत्मा पूर्ण निर्मल बन गई और उनके जीवन में केवलज्ञान का दिव्य प्रकाश व्याप्त हो गया। भगवान् महावीर का निर्वाण गौतम स्वामी के केवलज्ञान का निमित्त बन गया । ईस्वी पूर्व ५२७ कार्तिक शुक्ला प्रतिपदा का उषाकाल गौतम स्वामी के केवलज्ञान से प्रकाशमान हो गया। इसी दिन गौतम स्वामी सर्वज्ञ और सर्वदर्शी बन गये थे । प्रभु के निर्वाण से जन-समाज अथाह दुःख सागर में डूब गया था। गौतम के सर्वज्ञ बनने से उसमें अन्तर आया । चतुर्विध संघ अत्यन्त प्रसन्न हुआ और गौतम स्वामी की जय-जयकार करने लगा। महावीर का निर्वाण और गौतम के ज्ञान का प्रसंग एकरूप बनकर पवित्र स्मरण के रूप में सर्वदा स्मरणीय बन गया। गौतम का निर्वाण श्रमण भगवान् महावीर देहमुक्त सिद्ध हुए और गौतम स्वामी देहधारी मुक्तात्मा केवली हुए महावीर तीर्थ संस्थापक तीर्थंकर थे और गौतम सामान्य जिन बने। For Private & Personal Use Only विद्वत खण्ड/ १२३ www.jainelibrary.org
SR No.210267
Book TitleIndrabhuti Gautam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVinaysagar
PublisherZ_Jain_Vidyalay_Granth_012030.pdf
Publication Year2002
Total Pages14
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size2 MB
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