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________________ आध्यात्मिक योग और प्राणशक्ति ६५ . कटता है। यह मान्य सिद्धान्त था। आज हीरा शब्द की सूक्ष्मध्वनि से कटने लगा है। यन्त्र घूमता है। ध्वनि की सूक्ष्म तरंगें निकलती हैं और सूक्ष्म समय में ही हीरा कट जाता है। ये हैं शब्द के चमत्कार । इनसे आगे हैं-जप और मन्त्र के चमत्कार। __ शब्द का उच्चारण छह प्रकार से होता है । उसके छह प्रकार हैं-हस्व, दीर्घ, प्लुत, सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म और परमसूक्ष्म । मन्त्रविद् आचार्यों ने बताया है कि शब्द का ह्रस्व उच्चारण पाप का नाश करता है । दीर्घ उच्चारण लक्ष्मी की वृद्धि करता है, स्त्री की प्राप्ति कराता है और प्लुत उच्चारण ज्ञान की वृद्धि करता है। तीन उच्चारण और हैंसूक्ष्म, अतिसूक्ष्म और परमसूक्ष्म । ये समापत्ति करते हैं, ध्येय के साथ व्यक्ति को जोड़ देते हैं । ध्येय के साथ व्यक्ति का योग कर देते हैं। आप 'अहं' शब्द को लें। आप इसका उच्चारण करते हैं। इसका एक होता है ह्रस्व उच्चारण, एक होता है दीर्घ उच्चारण और एक होता है प्लुत उच्चारण । फिर सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म और परमसूक्ष्म। परमसूक्ष्म में आकर हमें लगता है कि हम पहुँच गये । अर्हत् का अनुभव करने लग गये। इन छहों प्रकार के उदाहरणों के भिन्न-भिन्न प्रभाव होते हैं। इस प्रकार हमें शब्द की शक्ति को पहचानना है, शब्द के अर्थ को समझना है और उच्चारण को भी समझना है। चौथी बात है-मन । मन को शब्द के साथ जोड़ देना। जिस शब्द का हम जाप कर रहे हैं उसके साथ मन का योग कर देना। इन सबका उचित योग मिलता है तब जप की शक्ति पैदा होती है । कोरी नौका से काम नहीं चलेगा। कोरी माला फेरने से काम नहीं चलेगा । यह हमें जानना होगा, समझना होगा कि नौका के साथ और क्या-क्या आवश्यक होता है नदी पार करने के लिए? यह हमें समझना होगा कि जप के साथ और क्या-क्या आवश्यक होता है ? 'णमो अरहंताणं' बहुत शक्तिशाली मन्त्र है। यह सही है । पर जब इसका उच्चारण भी शुद्ध नहीं होता तब यह फल कैसे देगा? इसका उच्चारण भी किसी उद्देश्य से कैसे होना चाहिए-यह जब तक नहीं जानते तो फिर हम इससे कैसे लाभ उठा पायेंगे ? लाभ नहीं पा सकेंगे। अपने अज्ञान और दोष के कारण ही मन्त्र या जप लाभदायी नहीं होता और हम सारा दोष मन्त्र या जप पर थोप देते हैं। हम कह देते हैं कि मन्त्र से कुछ नहीं बना। जप से कुछ लाभ नहीं हुआ । शब्द के उच्चारण के ध्येय को समझना भी बहुत जरूरी है। ये सब बातें जप के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। जप क्या है ? ध्येय के साथ एकरस हो जाना ही जप है। यह भी ध्यान है। महर्षि पतंजलि ने चित्तवृत्ति के निरोध को ध्यान माना है। चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ध्यान है। ध्यान का सम्बन्ध चित्त से है । जैन आचार्यों ने कहा-'ध्यानं त्रिविधम्-ध्यान के तीन प्रकार हैं--कायिक ध्यान, वाचिक ध्यान और मानसिक ध्यान । यह एक नया दृष्टिकोण है, नई परम्परा है। शरीर का शिथिलीकरण, शरीर की स्थिरता जो है वह है-कायिक ध्यान । वाचिक जप-वाणी का ध्येय के साथ में योग कर देना, ध्येय और वचन-दोनों में समापत्ति कर देना, दोनों को एकरस कर देना-यह है वाचिक ध्यान । मन का ध्येय के साथ योग कर देना, यह है मानसिक ध्यान । ये तीन प्रकार के ध्यान हैं। जप है-वाचिक ध्यान । यह वचन के द्वारा होने वाला ध्यान है। अर्थात वचन के माध्यम से हम इतने एकाग्र हो जाते हैं, इतने लीन हो जाते हैं कि हमारा ध्येय और हम दो नहीं रहते । आप णमो अरहंताणं' का जप करते हैं, लेकिन जब तक अहंत की कल्पना आपके मस्तिष्क में ठीक प्रकार से नहीं बैठ जाती और आप मन में यह भावना नहीं करते कि 'मैं स्वयं अर्हत होता जा रहा हूँ; तब तक 'णमो अरहंताणं' का लाभ प्राप्त नहीं हो सकता। हाँ, इतना सा लाभ अवश्य होता है कि उच्चारण के द्वारा जो तरंगें उत्पन्न होती हैं उनसे प्राणशक्ति में कुछ विकास होता है। किन्तु जप के द्वारा आपकी अर्हत् के रूप में जो परिणति होनी चाहिए थी, परिणमन होना चाहिए था, वह नहीं होता। इस बड़े लाभ से वंचित रहना पड़ता है। थोड़ा-सा लाभ प्राप्त होता है। बहुत बार ऐसा होता है कि हम बड़े ध्येय को लेकर चलते हैं, बड़ी बात को सामने रखकर चलते हैं किन्तु बीच में छोटा-सा लाभ होता है तो हम समझ लेते हैं कि लाभ मिल गया। यह बहुत बड़ा खतरा है। विकास के लिए बहुत बड़ा खतरा है। जिस बड़ी बात को लेकर हम चले, आत्मा की उपलब्धि सबसे बड़ी बात है, उसके लिए हम चले, बीच में कुछ प्राप्त हुआ, उसे ही सब कुछ मानकर आगे का प्रयत्न छोड़ देते हैं। उसी में सन्तुष्ट हो जाते हैं। यह सन्तोष भी बहुत बड़ा खतरा है। हमें सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए। ये तो रास्ते में ही मिलने वाले यात्री है, सहचारी हैं । आदमी यात्रा में चला । थक गया। रास्ते में विश्राम के लिए ठहरा । एक साथी मिल गया। उसके साथ रात भर रहा । बातचीत की। मनोरंजन किया। यदि उसे ही मंजिल मानकर वह वहीं रुक जाये तो वह कभी मंजिल पर नहीं पहुंच पाता। यह बहुत बड़ा खतरा है। ये प्राणविद्या की जितनी बातें हैं ये मध्य में मिलने वाले सहयात्री हैं। मिल जाते हैं, मन बहला लेते हैं। पर वह मंजिल की प्राप्ति नहीं है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210247
Book TitleAdhyatmik yoga aur Pranshakti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNavmal
PublisherZ_Pushkarmuni_Abhinandan_Granth_012012.pdf
Publication Year
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Spiritual
File Size1 MB
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