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________________ Jain Education International. • ६२ श्री पुष्करमुनि अभिनन्दन ग्रन्थ : नवम खण्ड से करना है अर्थात् उस काम में मन को समग्र रूप से लगा देना है । मन को इतना लगा देना है कि मन के सारे कोने भागने के लिए अवकाश ही न मिले। उसके सामने यह स्थिति यदि प्राप्त हो जाती है तो साधना सफल है । सफलता, यह एकमात्र रहस्य है साधना का । इसका तात्पर्य उसमें तन्मय हो जायें। एक भी कोना खाली न रहे, ताकि उसे अवकाश रहे ही नहीं । बेचारा भागेगा कैसे ? कहाँ भागेगा ? आप चाहें इसे साधना की पहली सफलता कहें या अन्तिम यह है कि साधना के द्वारा मन को इतना प्रशिक्षित कर देना कि हम जिस काम में उसे लगाना चाहें, वह उसी काम में लगे । हम जिस काम में उसे लगाना न चाहें, वह उस ओर झाँके ही नहीं। यदि इतना प्रभुत्व स्थापित हो जाता है। मन पर, तब कोई समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी । फिर हम अपने मन के मालिक हो जाते हैं । हम जो चाहें कर सकते हैं, जैसा चाहें वैसा कर सकते हैं। मन का अनेक टुकड़ों में बँट जाना ही समस्या है। हमारा मन इतने टुकड़ों में बँटा हुआ है कि हम उनकी गिनती भी नहीं कर सकते। यह बँटा हुआ मन सबसे बड़ी समस्या है मानव मात्र की। भगवान महावीर ने कहा- 'अणेगचित्ते खलु अयं पुरिसे' - मनुष्य अनेक मन वाला है। वह एक मन वाला नहीं है । अनेक मन हैं। उसके । वह अनेक भागों में बँटा हुआ है। इसीलिए वह किसी बात को पूरे मन से नहीं सोच पाता। यदि वह पूरे मन से सोचने लग जाय तो सचमुच ही उसकी नौका पार लग सकती है, अन्यथा नहीं । तो सबसे पहले आप देखें कि मन्त्र के साथ आपका मन संयुक्त है या नहीं। मन की पूरी शक्ति मन्त्र के साथ है या नहीं ? मन्त्र और मन दो बातें हैं । तीसरी बात है - आप मन्त्र के अर्थ को जान रहे हैं या नहीं ? मन्त्र के अर्थ को जानना बहुत जरूरी है । यदि मन्त्र का अर्थ नहीं जान रहे हैं तो आप जो करना चाहते हैं, जो होना चाहते हैं, वह नहीं कर सकेंगे, वह नहीं हो सकेंगे । परिणमन का सिद्धान्त शाश्वत है। कोई भी वस्तु शाश्वत नहीं है, स्थायी नहीं है। सब परिणमनशील हैं । परिणमन सत्य है । हर चीज बदलती है । परमाणु नष्ट नहीं होते। जो आकार है, जो संस्थान है जो रूप है, वह स्थायी नहीं हो सकता । सब परिणमनशील हैं । सब कुछ बदलेगा । आदमी भी बदलता रहता है । आत्मा शाश्वत है । वह नहीं बदलता | आदमी बदलता है । इसलिए आदमी जो होना चाहता है वैसा हो सकता है, उस रूप में बदल सकता है । उसका जो संकल्प होगा, उसी रूप में बदल जायेगा । आदमी जीवन के पहले क्षण से बदलता रहता है । प्रतिक्षण बदलता है | बदलने का क्रम बन्द नहीं होता। इसलिए संकल्प के अनुरूप वह बदल जाता है। अगर संकल्प नहीं है तो दूसरे रूप में बदलेगा। अगर संकल्प है तो संकल्प के अनुरूप बदलेगा । हमारे शरीर में कोशिकाएँ हैं जो शरीर की मूल घटक हैं। वे शरीर का निर्माण करती हैं। बहुत बड़ी संख्या है उनकी । हमारे शरीर में साठ हजार अरब कोशिकाएँ हैं । हमारे मस्तिष्क में प्रति घन सेमी० करोड़ कोशिकाएँ हैं। शरीर की कोशिकाएं प्रतिक्षण नष्ट होती है, नयी बनती हैं। हजारों कोशिकाएँ मरती हैं और हजारों गई जन्मती हैं। पुरानी क्षीण होती हैं और नई बनती हैं। यह चक्र निरन्तर चल रहा है। जब आदमी की अवस्था के अनुसार कोशिकाएँ क्षीण अधिक होती हैं और बनती कम हैं तब शरीर में क्षीणता आती है, मस्तिष्क कमजोर होता है। इन्द्रियाँ क्षीण हो जाती हैं, मस्तिष्क का नियन्त्रण ढीला हो जाता है । जवान आदमी अपने शरीर पर, अपने मस्तिष्क पर, अपने मन पर चाहे जैसा नियन्त्रण कर सकता है किन्तु बूढ़े आदमी की नियन्त्रण शक्ति क्षीण हो जाती हैं, ढीली हो जाती है । इसका कारण है कि साठ-सत्तर वर्ष की अवस्था में दस प्रतिशत मस्तिष्क क्षीण हो जाता है। इतनी कोशिकाएँ मर जाती हैं कि मस्तिष्क की शक्ति कम हो जाती है । यह शरीर के भीतर चलने वाला अवश्यम्भावी क्रम है। हम एक चिता को देखकर डर जाते हैं और कह देते हैं-अरे ! चिता जल रही है। मुर्दा जल रहा है। हम अपने भीतर देखें । एक नहीं, हजारों चिताएँ जल रही हैं निरन्तर । हजारों कोशिकाएँ मर रही हैं। हजारों कोशिकाओं का जन्म हो रहा है । जन्म और मरण—दोनों साथ-साथ चल रहे हैं । एक ओर श्मशान है तो दूसरी ओर प्रसूतिगृह । एक में मुर्दे जलाये जा रहे हैं, चिताएँ सजाई जा रही है और एक में नये-नये चेहरे जन्म ले रहे हैं, सूर्य की किरण का पहला स्पर्श कर रहे हैं । विचित्र है यह शरीर । हम इसे केवल बाहर से देखते हैं। बाहर हम श्मशान भी देखते हैं और प्रसूतिगृह भी देखते हैं । जन्मते बच्चों को भी देखते हैं और मरते बूढ़ों को भी देखते हैं। सब कुछ देखते हैं बाहर से, परन्तु भीतर से कुछ भी नहीं देखते । भीतर एक चक्र चल रहा है । निरन्तर बदल रहा है भीतर। तो क्या आप बदलते नहीं ? बदल तो रहे हैं । प्रतिक्षण संघर्ष चल रहा है भीतर । बनने और मिटने का काम हो रहा है निरन्तर । यह सारा स्वाभाविक हो रहा है। यदि आप संकल्प करें तो उस बदलने में परिवर्तन ला सकते हैं। यानी आप जो होना चाहें, वह हो सकते हैं। यह सारा का सारा होता है प्राण के स्तर पर । दो वस्तुएं हैं- आत्मा और प्राण एक है आत्मशक्ति और एक है प्राणशक्ति एक है प्राणबल और एक है For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210247
Book TitleAdhyatmik yoga aur Pranshakti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNavmal
PublisherZ_Pushkarmuni_Abhinandan_Granth_012012.pdf
Publication Year
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Spiritual
File Size1 MB
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