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________________ ६० महावीर वाणी के अनुसार श्रमण की कतिपय अन्य विशेषताओं का भी दर्शन साम्य तुलसी साहित्य में असंदिग्ध है (१) इलाहार बिहारी रहित साह, वे समणी । प्रवचनसार अर्थात् उपयुक्त आहार-बिहार से युक्त तथा कथायों से रहित भ्रमण होता है। (२) समे य जे सव्वपाणभू तेसु से हु समणे प्रश्नव्याकरण अर्थात् जो सभी प्राणियों पर सम भाव रखता है वही श्रमण है । (३) दंसणाणसमग्गो समणो सो संजदो भणिदो । - -प्रवचनसार अर्थात् दर्शन और ज्ञान से परिपूर्ण श्रमण को संयत कहा गया है। (४) सुद्धस्स य सामण्णं भणियं सुद्धस्स दंसणं गाणं । सुद्धस्स य णिग्वाणं सो च्चिव सिद्धो णमो तस्स ॥ - प्रवचनसार अर्थात् शुद्धोपयोग को श्रमणत्व कहा गया है और शुद्ध को दर्शन तथा ज्ञान । शुद्ध को निर्वाण होता है और वही सिद्ध होता है । उस सिद्ध को नमस्कार है । (५) सत्तू मित्ते यसमा बोधपाहुड अर्थात् जो शत्रु और मित्र में समभाव रखता है, वह श्रमण है । तुलसी की निम्नोक्त चौपाइयों में भक्त की जो विशेषतायें व्यक्त की गई हैं वे निश्चय ही श्रमण के उपरोक्त गुणों का ही पर्याय हैं सरल स्वभाव न मन कुटिलाई । जथा बैरन बिग्रह आस न वासा । सुखमय अनारंभ अनिकेत अमानी । अनघ प्रीति सदा सज्जन संसर्गी । तृन सम महावीर वाणी के अनुसार निर्मल मन वाले को श्रमण कहा गया है - और तुलसी भी कुछ इसी प्रकार सच्चे भक्त की पहचान बताते हैंनिर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥ तुलसी तो यहां तक कह गए हैं कि रसना सांपिनि बदन बिल जो न जपह हरिनाम । तुलसी प्रेम न राम सों, ताहि विधाता बाम ॥ महावीर वाणी में परिग्रह' त्याज्य माना गया है(१) लोभ- कलि- कसाय महासंघो प्रश्नव्याकरण परिग्रह रूपी वृक्ष के तने लोभ, क्लेश और कषाय हैं । (२) णिग्गंथो वि विसएसु-भगवती आराधना लाभ-सन्तोष सदाई | ताहि सदा अब आसा ॥ अरोष बच्छ विग्यानी । विषय - स्व-अपवर्गी | तो समणो जय सुमणो (३) आचेलक्को धम्शुो पुरिमचराणं- मूलाराधना साधु को सम्पूर्ण परिग्रह का त्याग करना चाहिए। अपरिग्रही होने से विषय अभिलाषाओं का अभाव हो जाता है। (४) सम्यतोवती साहू सत्य होइ अपवसो । मूलाराधना - जो साधू सभी वस्तुओं की आसक्ति से मुक्त होता है, वही जितेन्द्रिय तथा आत्मनिर्भर होता है । Jain Education International (५) असज्जमाणो अपडिबद्ध े या वि विहरइ – उत्तराध्ययनसूत्र जो अनासक्त है, वह सर्वत्र निर्द्वन्द्व भाव से विचरण करता है । (६) सम्वत्थ भगवया अनियाणया पसत्था स्थानांगसूत्र सर्वत्र भगवान् ने निष्कामता को श्रेष्ठ कहा है । 'परिग्रह' से विरक्ति की प्राप्ति होती है । इसी को भक्त का प्रमुख आचार्य रत्न श्री देशभूषण जी महाराज अभिनन्दन ग्रन्थ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210237
Book TitleAdhunik Dharmik Ekta ke Pariprekshya me Tulsi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagat Bhandari
PublisherZ_Deshbhushanji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012045.pdf
Publication Year1987
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size531 KB
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