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________________ આચાર્ય શ્રી વિજયવલભયરિવર [ ૧૧૫ चुकी थी। इस समय स्वर्गवासी गुरुदेव श्री १००८ श्री विजयानन्दसूरिवर ( आत्मारामजी महाराज )का बड़ोदा शहरमें पधारना हुआ । इन धर्मकथा-लब्धिसम्पन्न परम गुरुदेवकी धर्मदेशनाका असर अपने चरित्रनायक - जिनका शुभ नाम गृहवासमें " छगनलाल" था, - पर खूब पड़ा । उसी समयसे आपने अपने जीवनको गुरुदेवके चरणोंमें न्योछावर कर देनेका अपने दिलसे निश्चय कर लिया, अर्थात् दीक्षा ग्रहण करनेका दृढ़ संकल्प कर लिया। और अपने बड़े भाई श्रीयुत स्वीमचन्दभाईसे अपना निश्चय भी जाहिर कर दिया। संसारमें मोह भी एक बड़ी चीज़ है। बड़े भाईने दीक्षा लेनेसे आपको मना कर दिया, तो भी आप गुरुदेवके साथ रह कर धर्माराधन करने लगे। यह देख कर आपके बड़े भाईको गुरुदेवके प्रति असंतोष एवं अविश्वास होने लगा। उस समय गुरुदेवने लाभालाभका विचार करके खीमचंदभाईसे कहा कि जब तक आपकी सम्मति न मिलेगी जब तक " छगन "को दीक्षा नहीं दी जाय यह विश्वास रखना । अन्तमें आपको दृढ़ वैराग्य भावनाको देख कर, कई महीनों के बादमें, आपके बड़े भाईने गुरुदेवके चरणमें क्षमाप्रार्थनाके साथ आपको दीक्षा देने के लिये सम्मति दे दी। खीमचंदभाईकी अनुमति मिल जाने पर गुरुदेवने संवत् १९४४ वैशाख शुक्ल १३के दिन राधनपुरमें दीक्षा दी। आपको श्री हर्षविजयजी महाराजका शिष्य बनाया और नाम " मुनि श्री वल्लभविजयजी" रक्खा गया । सुशिष्यत्व--आप जन्मसंस्कारसम्पन्न आत्मा होनेसे एवं आपको अपनी माताकी ओरसे धर्मके दृढ़ संस्कारोंका वारसा मिलनेके कारण आपमें अनेकानेक गुण भरे थे। फिर भी भविष्यमें उन्हें महापुरुष होनेके लिये जिन गुणोंको आवश्यकता थी वे सर्वशास्त्रपारंगत धर्मधुरंधर सर्वगुगसम्पन्न गुरुदेव श्री १००८ श्री विजयानन्दसूरिवरकी छायामें प्राप्त हो गए। गुरुदेवको भी अपने इस लघुतम शिष्यकी सहज विनयशीलता, बुद्धि, कार्यदक्षता आदिका परिचय अल्प समयमें ही हो गया । अतः आपने अपने महत्त्वके धर्मकार्योंका भार इनके ऊपर डाल दिया। आपके लिए गुरुदेवके अंतःकरणमें अनेकानेक शुभ आशायें थी। यही कारण था कि उन गुरुदेवने अपने इस गुगगुरु लघु शिष्यके प्रति अपनी असीम कृपाकी धारा बहाई थी । आपके हृदयमें यह भी प्रतीत हो गया था, कि आप जैनधर्म एवं जैन समाजकी उन्नतिके लिए जो कुछ करना चाहते हैं उसकी पूर्णाहुति इस लघु शिष्यके द्वारा होने वाली है। इसो अटल विश्वासके कारण अपने देहान्त होनेके समय आपने पंजाब-श्रीसंघके समक्ष अपने इस लघु शिष्यको आचार्य पदसे सम्मानित करने की शुभ आशा प्रकट की थी। सचमुच ही जगतमें ऐसा गुरु-शिष्य सम्बन्ध धन्य है, जहाँ शिष्य अपने विशिष्ट गुणोंके द्वारा गुरुदेवके हृदयको अपनी तरफ कर लेता है और गुरुदेव अपने गुणविभूषित विनीत शिष्यको देख कर प्रसन्न होते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210196
Book TitleVijayvallabhsuri
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay
PublisherPunyavijayji
Publication Year1969
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size474 KB
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