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________________ वह अपने स्वतंत्र नियमों का पालन करती है। इसे प्राचीन प्राकृत कहा है। साधारणतया मगध के आधे हिस्से में बोली जाने वाली भाषा को अर्धमागधी कहा गया है। अभयदेवसूरि के अनुसार इस भाषा में कुछ लक्षण मागधी के और कुछ प्राकृत के पाए जाते हैं अतएव इसे अर्धमागधी कहा है। मार्कण्डेय ने शौरसेनी के समीप होने के कारण, मागधी को ही अर्धमागधी कहा है। क्रमदीश्वर ने अपने संक्षिप्तसार में इसे महाराष्ट्री और मागधी का मिश्रण बताया है। इनसे यही सिद्ध होता है कि आजकल की हिन्दी भाषा की भांति अर्धमागधी जन-सामान्य की भाषा थी जिसमें महावीर ने सर्वसाधारण को प्रवचन सुनाया था। २ आगमों की टीकाएं आगम साहित्य पर नियुक्ति, भाष्य, चूर्णीटीका, विवरण- विवृत्ति, वृत्ति दीपिका, अवचूरि, अवचूर्णीध्याख्या, व्याख्यान पञ्जिका, आदि विपुल व्याख्यात्मक साहित्य लिखा गया है। आगमों का विषय अनेक स्थलों पर इतना सूक्ष्म और गंभीर है कि बिना व्याख्याओं के उसे समझना कठिन है। इस व्याख्यापूर्ण साहित्य में 'पूर्वप्रबन्ध' वृद्ध सम्प्रदाय, वृद्ध व्याख्या, केवलिगम्य आदि के उल्लेख व्याख्याकारों ने पूर्व प्रचलित परम्पराओं में प्रतिपादित किया है। नियुक्ति, भाष्य, चूर्णी और कतिपय टीकाएं प्राकृत में लिखी गयी है जिससे प्राकृत भाषा और साहित्य के विकास पर प्रकाश पड़ता है। इन चारों व्याख्याओं के साथ मूल आगमों को मिला देने से यह साहित्य पश्चाङ्गी साहित्य कहा जाता है। " व्याख्यात्मक साहित्य में नियुक्तियों (निश्चिता उक्तिः नियुक्तिः का स्थान सर्वोपरि है सूत्र में निश्चय किया हुआ अर्थ जिसमें निबद्ध हो उसे नियुक्ति कहते हैं नियुक्ति आगमों पर आर्या छन्द में प्राकृत गाथाओं में लिखा हुआ संक्षिप्त विवेचन है। आगमों का प्रतिपादन करने के लिए इसमें अनेक कथानक, उदाहरण और दृष्टांतों का उल्लेख किया गया है। इस साहित्य पर टीकाएं भी लिखी गयी हैं। संक्षिप्त और पद्यबद्ध होने के कारण इसे आसानी से कंठस्थ किया जा सकता है। आचारांग, सूत्रकृतांग, सूर्यप्रज्ञप्ति, व्यवहारकल्प, दशाश्रुतस्कन्ध, उत्तराध्ययन, आवश्यक, दशवैकालिक और ऋषिभाषित इन दस सूत्रों पर नियुक्तियां लिखी गयी हैं। इनमें विषयवस्तु की दृष्टि से आवश्यक नियुक्ति का स्थान विशेष महत्त्व का है। पिंडनियुक्ति और ओघनियुक्ति मूल सूत्रों में गिनी गयी है। इससे नियुक्ति साहित्य की प्राचीनता का पता चलता है कि वल्लभी वाचना के समय ई. सन् की पांचवी छठी शताब्दी के पूर्व ही संभवतः यह साहित्य लिखा जाने लगा था। अन्य स्वतन्त्र नियुक्तियों में पंचमंगलश्रुत स्कन्धनियुक्ति, संसक्तनियुक्ति, गोविन्दनियुक्ति और आराधनानिर्युक्ति मुख्य हैं। नियुक्तियों के लेखक परंपरा के अनुसार भद्रबाहु माने जाते हैं, जो छेद सूत्रों के कर्ता अंतिम श्रुत- केवलि से भिन्न है। नियुक्तियों की भांति, भाष्य साहित्य भी आगमों पर लिखा गया है, जो कि प्राकृत गाथाओं, संक्षिप्त शैली और आर्या छन्द में लिखा श्रीमद् जयंतसेनसरि अभिनंदन ग्रंथ वाचना Jain Education International गया है। कुछ स्थलों पर नियुक्ति और भाष्य की गाथाएं परस्पर मिश्रित हो गई हैं। इसलिए उनका अलग अध्ययन करना कठिन पड़ता है। नियुक्तियों की भाषा के समान भाष्यों की भाषा भी मुख्य रूप से प्राचीन प्राकृत अथवा अर्धमागधी है। सामान्यतया भाष्यों का समय ई. सन् की ४-५ वीं शताब्दी माना जाता है। निशीथ, व्यवहार, कल्प, पंचकल्प, जीतकल्प, उत्तराध्ययन, आवश्यक, आवश्यक, दशवैकालिक पिण्डनिर्युक्ति इन सूत्रों पर भाष्य लिखे गए हैं। इनमें निशीथ, व्यवहार और कल्पभाष्य विशेष कर जैनसंघ का प्राचीन इतिहास जानने के लिए अतीव उपयोगी है इन तीनों भाष्यों के कर्ता संपदास ठाणि क्षमा-श्रमण है जो हरिभद्रसूरि के समकालीन थे। ये वसुदेवहिण्डी के कर्ता संघदास गणिवाचक से भिन्न है। आगमों पर लिखे गए व्याख्या साहित्य में चूर्णियों का स्थान महत्वपूर्ण है। यह साहित्य गद्यशैली में लिखा गया है। संभवतः जैन तत्त्वज्ञान और उससे सम्बन्ध रखने वाले कथा - साहित्य का विस्तार पूर्वक विवेचन करने के लिए पद्य साहित्य पर्याप्त न समझा गया। इसके अतिरिक्त यह भी जान पड़ता है कि संस्कृत की प्रतिष्ठा बढ़ जाने से शुद्ध प्राकृत की अपेक्षा संस्कृत मिश्रित प्राकृत में साहित्य लिखना आवश्यक समझा जाने लगा। इस कारण इस साहित्य की भाषा को मिश्र प्राकृत भाषा कहा जा सकता है। आचारांग, सूत्रकृतांग, व्याख्याप्रज्ञप्ति-कल्प, व्यवहार, निशीथ, पंचकल्प, दशाश्रुत स्कन्ध, जीतकल्प, जीवाभिगम, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति, उत्तराध्ययन, आवश्यक दशवैकालिक, नन्दी और अनुयोगद्वार इन सोलह आगमों पर चूर्णियां लिखी गयी हैं। इनमें पुरातत्त्व के अध्ययन की दृष्टि से निशीय चूर्णी और आवश्यक चूर्णी का विशेष महत्व है। इस साहित्य में तत्कालीन रीति रिवाज, देश, काल, सामाजिक, व्यवस्था, व्यापार आदि का रोचक वर्णन मिलता है। वाणिज्य कुलीन कोटिकगणीय वज्रशाखीय जिनदास गणि महत्तर अधिकांश चूर्णियों के कर्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनका समय ई. सन् की छठी शताब्दी माना जाता है। आगमों पर अन्य अनेक विस्तृत टीकाएं और व्याख्याएं भी लिखी गयी हैं। अधिकांश टीकाएं संस्कृत में हैं, यद्यपि कतिपय टीकाओं का कथा सम्बन्धी अंश प्राकृत में उद्धृत किया गया है। आगमों के प्रमुख टीकाकारों में याकिनीसूनु, हरिभद्रसूरि और मलयगिरि आदि आचार्यों के नाम उल्लेखनीय है टीकाओं में आवश्यक टीका और उत्तराध्ययन की पाइय (प्राकृत) टीका आदि मुख्य है। इसके अतिरिक्त वर्तमान शताब्दी में हिन्दी भाषा में भी अनेक विद्वान् आचार्यों ने अच्छा व्याख्यात्मक साहित्य लिखा है। १ 2 ३ ५. संस्कृत हिन्दी कोश, ले. वामन शिवराम आपटे, पृ. १३४-४० रत्नाकरावतारिकावृत्ति आप्तवचनादाविर्भूतमर्थसंवेदनमागमः । उपचारादाप्तवचनंदया। स्याद्वादमंजरी श्लो. टीका सासिज्जइ जेण तयं सत्यं तं वा विसेसियं नाणं । आगम एव य सत्यं तु सुयनाणं । विशेषावश्यकभाष्य गा. ५५९ अंत्थं भासइ अरहा, सुत्रं गन्धन्ति गणहरानिपुणं / सासणस्स हि ४१ For Private & Personal Use Only न्यायनीति रख नम्रता, छोड़ सकल अभिमान । जयन्तसेन अवश्य हो, जीवन का उत्थान ॥ www.jainelibrary.org.
SR No.210157
Book TitleAgam Sahitya ka Anushilan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSuvratmuni Shastri
PublisherZ_Jayantsensuri_Abhinandan_Granth_012046.pdf
Publication Year
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & Agam
File Size3 MB
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