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________________ Jain Education International ६१४ कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड सकते हैं । अभी-अभी हमने ज्ञातासूत्र के मूलपाठ का संशोधन और निर्धारण किया है। उसके कार्यकाल में इस प्रकार की त्रुटियों के पाठ सामने आये । हमने उनके पौर्वापर्य को पकड़कर पाठ की सप्रमाण संगति बैठाने का प्रयास किया है और उनका विमर्श पाद-टिप्पणों में दिया है। उन पाद-टिप्पणों के अवलोकन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पाठ-विपय के कितने प्रकार हो जाते हैं। मैं मानता हूँ कि आगम सम्पादन में पाठ निर्धारण का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसके बिना अर्थ, टिप्पण आदि विपर्यस्त हो जाते है । पाठ निर्धारण में प्राचीन प्रतियाँ मात्र सहायक नहीं बनती। प्रत्येक शब्द का पौर्वापर्य और अर्थ जान लेना भी पाठ निर्धारण में आवश्यक होता है । +0+0+8 जो व्यक्ति पौवापर्य या अर्थ की ओर ध्यान न देकर केवल प्राचीन प्रतियों के आधार पर पाठ का निर्धारण करते हैं, वे एक नई समस्या पैदा कर देते हैं । ज्ञातासूत्र के एक उदाहरण से यह अत्यन्त स्पष्ट हो जाता है थावच्चापुत्त बाईसवें तीर्थंकर अरिष्टनेमि के शासन के श्रमण थे। शैलकपुर का राजा शैलक उनके पास गया । धर्म सुना और आगार धर्म स्वीकार करने की बात कही । श्रमण ने उसे व्रतों का निर्देश दिया । ज्ञातासूत्र (१।५।४५ ) के इस प्रसंग का प्रतियों में इस प्रकार उल्लेख है "तरण से सेलव राया बावच्चायुत्तरस अणगारस्स अंतिए पंचाणुम्बइयं तत्त सिखाइ दुवालसविहं निधिमं उपसंपज " इसका अर्थ है तब शैलक राजा ने थावच्चापुत्त अनगार के पास पाँच अणुव्रत और सात शिक्षाव्रत - इस प्रकार बारह-विध गृहधर्म को स्वीकार किया । यहाँ मीमांसनीय यह है कि बाईसवें तीर्थंकर के समय में बारह प्रकार के गृहस्थ धर्म का प्रचार नहीं था । क्योंकि पहले और अन्तिम तीर्थकरों के अतिरिक्त शेष बाबीस तीर्थंकरों के शासन में 'चातुर्याम धर्म' का ही प्रचलन होता है। यहां जो पांच अणुव्रत और सात शिक्षायतों का उल्लेख है, यह महावीरकालीन परम्परा का द्योतक है। पाठ की पूर्ति करने वालों ने इस स्थल पर इतना विचार नहीं किया। उन्होंने औपपातिक सूत्र के अनुसार यहाँ इस सन्दर्भ में पाठ-पूर्ति कर दी। वहाँ पाँच अणुव्रत और सात शिक्षावतों के ग्रहण का निर्देश है। वह केवल महावीर के श्रावकों के लिए है, न कि मध्यवर्ती बाईस तीर्थंकरों के श्रावकों के लिए। किन्तु प्रस्तुत सन्दर्भ में अरिष्टनेमि के शासन की बात आ रही है, अतः यहाँ 'भाउज्यामियं निहिधम्म परिवरज' ऐसा पाठ होना चाहिए। हमने यह भी देखा है कि कुछेक विद्वानों ने आगम पद्यों में छन्द की दृष्टि से कुछेक शब्दों का हेरफेर कर पद्यों को छन्ददृष्टि से शुद्ध करने का प्रयत्न किया है। वहाँ पर भी बहुत बड़ा भ्रम उत्पन्न हुआ है । प्राकृत पद्यों के अपने छन्द हैं, जो कि अनेक हैं। एक ही श्लोक के चारों चरणों के चार भिन्न-भिन्न छन्द प्राप्त होते हैं । किन्हीं श्लोकों में तीन और किन्हीं में दो छन्द भी प्राप्त होते हैं । ऐसी स्थिति में श्लोक के चारों चरणों में एक ही छन्द कर देना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार का परिवर्तन अनधिकार चेष्टा मात्र है । ५६८ विवराणि ८।१६५ किच्छोवगयपाणं २०१७ वित्तिए पाठ-भेदों के कारणों को और अधिक स्पष्ट करने के लिए मैं दो आगमों ज्ञाता और आचारांग के कुछेक उदाहरण सप्रमाण प्रस्तुत कर रहा हूँ १. ज्ञाताधर्मका के स्थान पर विरहाणि किछपाणोवगयं विहरित्तए For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.210156
Book TitleAgam Path Samshodhan Ek Samasya Ek Samadhan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherZ_Kesarimalji_Surana_Abhinandan_Granth_012044.pdf
Publication Year1982
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle & Agam
File Size715 KB
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