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________________ हम सम्पत्ति के साथ साता, सुख और संतोष का भी अर्जन कर सकते हैं। ___ यही बात कबीरदास ने अपने शब्दों में कही - "गाय-बैल, हाथी-घोड़े और मणि-माणिक्य, ये सब धन होंगे परन्तु एक इनसे भी बड़ा धन है। वह "संतोष-धन" जब उपलब्ध होता है तो ये सारे धन महत्व हीन हो जाते हैं।" गो धन, गज धन, बाजि-धन, और रतन धन खान, जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान। क्या दिया है परिग्रह ने? आज परिग्रह की मूर्छा में से उपजा असंतोष मनुष्य को अनेक वर्जित दिशाओं में ले जा रहा है। कामनाओं से तृषित पत्नी अपने पति से संतुष्ट नहीं है। धन के मद में नित-नई चाह रखनेवाला पति अपनी पत्नी में कोई नवीनता नहीं देख पाता। उसकी दृष्टि कहीं अन्यत्र है। जहाँ व्यभिचार के अवसर नहीं है वहाँ भी मानसिक व्यभिचार निरंतर चल रहा है। जीवन तनावों में कसा हुआ नरक बन रहा है। जिसके पास जो कुछ है, वह उससे संतुष्ट नहीं है। एक कोयल का बच्चा रो रहा था। उसे अपने काले-कलूटे पंखों पर चिढ़ आ रही थी। अभी-अभी उसने मयूर की पीठ पर सुन्दर सतरंगे पंख देखे थे। उसे भी ऐसे ही लुभावने पंख चाहिये। कोयल जब अपने नन्हें-मुन्ने को समझाते-समझाते थक गई तब उसे लेकर मयूरी के पास चली। शायद उसके गिरे-पड़े पंख पाकर ही बच्चा बहल जाये। पर वहाँ दूसरा ही तमाशा हो रहा था। मयूर का बच्चा मचल-मचल कर रो रहा था। उसे अपनी भोंड़ी आवाज एकदम नापसन्द थी। उसे कोयल की तरह मीठी और सुरीली आवाज चाहिये। हमारे साथ भी क्या ऐसा ही नहीं हो रहा? जिसके पास जो है, उसमें उसे कोई सुख, कोई संतोष नहीं मिल रहा। परन्तु जो उसके पास नहीं है, और दूसरों के पास है, उसका अभाव उसे निरंतर दुखी किये हुए है। संसार के किसी भी पदार्थ को ले लें, किसी भी उपलब्धि की बात सोच कर देख लें। जिसे वह प्राप्त नहीं है वह उसे पाने के लिये दुखी है, परन्तु जिसे वह प्राप्त है, वह भी सुखी नहीं वह तो किसी और पदार्थ के लिये, किसी दूसरी उपलब्धि के लिये अपने मन में लालसा पाल रहा है। उसी लालसा में दिन-रात दुखी हो रहा है। भिखारी बना दिया है लालसा ने __ हम अनुभव कर सकते हैं कि आज परिग्रह के प्रति यह अंधी लालसा, सारे पापों और अनीतियों का कारण बनकर हमारे जीवन को प्रदूषित और मलिन कर रही है। यदि इस प्रदूषण से बचकर जीवन को उसकी स्वाभाविक चमक और पवित्रता प्रदान करनी है, तो हमें अपनी परिग्रह-प्रियता पर विचार करना ही होगा। इसका कोई अन्य मार्ग नहीं है। तृष्णा का दंश बहुत विषहरा होता है। उसकी लहर में मन की प्यास बढ़ती जाती है। चित्त में क्षोभ बना रहता और मनुष्य एक विशेष प्रकार की रुग्ण मानसिकता का शिकार हो जाता है। दो पंक्तियाँ मुझे याद आती हैं २७६ सद्ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं। सद्ज्ञान के बिना अनन्त सुख की भी उपलब्धि नहीं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210088
Book TitleAparigraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNiraj Jain
PublisherZ_Lekhendrashekharvijayji_Abhinandan_Granth_012037.pdf
Publication Year1990
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Five Geat Vows
File Size754 KB
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