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________________ अपभ्रंश साहित्य-परम्परा ४८३. . .................................................................... .... का "प्रवचनसार" (१९६६ ई०) तथा टी• हनाकी का "अनुयोगद्वारसूत्र" (१९७०) इत्यादि । १९२५ ई० में किरफल (Kirfel) ने उपांग "जीवाजीवाभिगम" के सम्बन्ध में प्रतिपादन कर यह बताया था कि वस्तुतः यह "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" से सम्बद्ध है । सन् १९२६ में वाल्टर शुब्रिग ने अपनी पुस्तक "वोर्त महावीराज" के परिचय में जैनागमों के उद्भव विकास के साथ ही उनका साहित्यिक मूल्यांकन भी किया था। सन् १९२६ में हेम्बर्ग में काम्पत्ज (Kamptz), ने आगमिक प्रकीर्णकों को लेकर शोधोपाधि हेतु अपना शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत कर डाक्टरेट प्राप्त की थी। जैनागम के टीका-साहित्य पर सर्वेक्षण का कार्य अर्नेस्ट ल्युमन ने बहुत ही परिश्रमपूर्वक किया था, किन्तु वे उसे पूर्ण नहीं कर कर सके । अनन्तर "ओवेरश्चिट ओवेर दि आवश्यक लिटरेचर" के रूप में वाल्टर शुबिंग ने १९२४ में हेम्बर्ग से प्रकाशित किया। इस प्रकार जैनागम तथा जैन साहित्य की शोध-परम्परा के पुरस्कर्ता जरमन विद्वान् रहे हैं। आज भी वहाँ शोध व अनुसन्धान का कार्य गतिमान है । सन् १९३५ में फेडेगन (Faddegon) ने सुप्रसिद्ध दिगम्बर जैनाचार्य कुन्दकुन्द ने "प्रवचनसार" का अंग्रेजी अनुवाद किया था। इस संस्करण की विशेषता यह है कि आचार्य अमृतचन्द्र की "तत्त्वप्रदीपिका" टीका, व्याख्या व टिप्पणों से यह अलंकृत है। ऐसे अनुवादों की कमी आज बहुत खटक रही है। इस तरह के प्रकाशन की ओर हमारा ध्यान जाना चाहिए । वर्तमान युग में सम्यक् दिशा में सम्यक् कार्य होना नितान्त अपेक्षित है। - साहित्यिक विधाओं में जैन कथा-साहित्य पर सर्वप्रथम डॉ. जेकोबी ने प्रकाश डाला था। इस दिशा में प्रमुख रूप से अर्नेस्ट ल्युमन ने पादलिप्तसूरि की "तरंगवतीकथा" का जर्मन भाषा में सुन्दर अनुवाद "दाइ नोन' (Die Nonne) के नाम से १९२१ ई० में प्रकाशित किया था। तदनन्तर हर्टेल ने जैन कथाओं पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया। क्लास बुहन ने "शीलांक के चउप्पनमहापुरिसचरियं" पर शोधोपाधि प्राप्त कर सन् १९५४ में उसे हेम्बर्ग से प्रकाशिन किया। आर० विलियम्स ने "मणिपतिचरित" के दो रूपों को प्रस्तुत कर मूल ग्रन्थ का अंग्रेजी अनुवाद किया। इस तरह समय-समय पर जैन कथा साहित्य पर शोध-कार्य होता रहा है। . जैन-दर्शन के अध्ययन की परम्परा हमारी जानकारी के अनुसार आधुनिक काल में अल्ब्रेख्त वेबर के "फेगमेन्ट आव भगवती" के प्रकाशन से १८६७ ई० से मानना चाहिए। कदाचित् एच० एच० विल्सन ने सर्वप्रथम "ए स्केच आव द रिलीजियस सेक्ट्स आव द हिन्दूज" (जिल्द १, लन्दन), (१८६२ ई.) पुस्तक में जैनधर्म तथा जैनदर्शन का उल्लेख किया था। किन्तु उस समय तक यही माना जाता था कि जैनधर्म हिन्दूधर्म की एक शाखा है। किन्तु वेबर, जेकोबी, ग्लासनेप आदि जरमन विद्वानों के शोध व अनुसन्धान कार्यों से यह तथ्य निश्चित व स्थिर हो गया कि जैनधर्म एक स्वतन्त्र दर्शन व मौलिक परम्परा है । इस दृष्टि से डॉ० हेल्मुथ वान ग्लासनप की पुस्तक "द डाक्ट्राइन आव कर्मन इन जैन फिलासफी" अत्यन्त महत्वपूर्ण है जो सन् १९४२ में बम्बई से प्रकाशित हुई थी। ऐतिहासिक दृष्टि से जीमर और स्मिथ के कार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । एफ० डल्ब्यू ० थामस ने आ० हेमचन्द्र कृत "स्याद्वादमंजरी" का बहुत सुन्दर अंग्रेजी अनुवाद किया जो १९६० ई० में बलिन से प्रकाशित हुआ। १९६३ ई० में आर० विलियम्स ने स्वतन्त्र रूप से “जैन योग” पर पुस्तक लिखी जो १९६३ ई० में लन्दन से प्रकाशित हुई । कोलेट केल्लट ने जैनों के श्रावक तथा मुनि आचार विषयक एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक "लेस एक्सपिएशन्स डान्स ले रिचुअल एन्शियन डेस रिलिजियक्स जैन" लिखकर १९६५ ई० में पेरिस से प्रकाशित की । वास्तव में इन सब विषयों पर इस लघु निबन्ध में लिख पाना सम्भव नहीं है । केवल इतना ही कहा जा सकता है कि परमाणुवाद से लेकर वनस्पति, रसायन आदि विविध विषयों का जैनागमों में जहाँ कहीं उल्लेख हुआ है, उनको ध्यान में रखकर विभिन्न विद्वानों ने पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही विश्वकोशों में भी उनका विवरण देकर शोध व अनुसन्धान की दिशाओं को प्रशस्त किया है। उनमें से जैनों के दिगम्बर साहित्य व दर्शन पर जरमनी विद्वान् वाल्टर डेनेके (Walter Denecke) ने अपने शोध-प्रबन्ध में १. प्रोसीडिंग्स आव् द सेमिनार इन प्राकृत स्टडीज, पूना यूनिवर्सिटी, १९७०, पृ० २१० २. वही, पृ० २१० ३. वही, पृष्ठ २११ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210082
Book TitleApbhramsa Sahitya Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDevendramuni Shastri
PublisherZ_Kesarimalji_Surana_Abhinandan_Granth_012044.pdf
Publication Year1982
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Literature
File Size760 KB
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