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________________ खण्ड ४ : धर्म, दर्शन एवं अध्यात्म चिन्तन इसके बाद तुरन्त ही वह परमानन्द में डूब गया। अमर्याद आनन्द। इसके साथ या इसके पीछे जो बौद्धिक ज्ञानप्रकाश उभरा, उसे वाणी में किस प्रकार से व्यक्त किया जाए, इसका वर्णन करना अशक्य है। उसके दिमाग में ब्राह्मी ऐश्वर्य की एक विद्य तरेखा-सी प्रस्तुत हो गई, जिसका प्रकाश इसके बाद उसके सारे जीवन को आलोकित करता रहा । उसके हृदय पर ब्रह्मामृत की एक बूंद गिरी, जो मुक्तिसुख का आस्वाद सदा के लिए छोड़ गई ।''1 _इस अनुभव के बाद डा० बक ऐस अनुभव से भलीभांति परिचित एक ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में आये, जिनके साथ की बातचीत ने, उन्हें स्वयं को जो अनुभव हुआ था, उसके रहस्य पर अत्यन्त प्रकाश डाला। इसके बाद उन्होंने इस विषय में संशोधन करके एक ग्रन्थ की रचना की, जिसका नाम है'Cosmic Con ciousness'--'विश्वचेतना' । स्वयं के उपर्युक्त विषय के अनुभव में इस ग्रन्थ में विशेष विवरण देते हुए वे लिखते हैं ___..."उसका यह दावा है कि इस अनुभव से पूर्व महीनों अथवा वर्षों के अभ्यास द्वारा जितना ज्ञान उसको मिला होगा, उसके बनिस्बत अधिक ज्ञान उसको इस अनुभव के थोड़े-से ही क्षणों में मिल गया-कुछ ऐसा ज्ञान, जो चाहे जितने अभ्यास के द्वारा प्राप्त होना संभव न था। यह प्रचण्ड ज्ञानप्रकाश थोड़े ही क्षणों तक रहा, किन्तु उसका असर स्थायी रहा । उन क्षणों में उसने जो देखा एवं जाना, उसे वह कभी भी भूल नहीं सकता। इसी प्रकार उस समय उसके चित्त के समक्ष जो प्रगट हुआ, उसमें उसने कभी शंका नहीं उठाई-शंका उठ ही नहीं सकती।' दक्षिण भारत के विश्व-विख्यात सन्त श्री रमण महर्षि को इस जीवन के किसी भी प्रयत्न अथवा साधना के बिना, अचानक ही आत्मानुभूति प्राप्त हुई थी। हाईस्कूल के अन्तिम वर्ष में वे अभ्यास कर रहे थे । उस समय मात्र सत्रह वर्ष की आयु में, एक दिन अचानक उनको यह असाधारण अनुभूति हई । शरीर पूर्ण स्वस्थ होते हुए भी, एक दिन सहसा मृत्यु के भय ने उनको घेर लिया । किसी बाहरी निमित्त के बिना ही उन्हें ऐसी प्रतीति हुई, मानो मृत्यु ने अपना पंजा उनकी ओर फैला दिया है। शरीर को शव की भाँति निश्चेष्ट बनाकर वे सो गये-मानो शरीर निष्प्राण हो गया हो, ऐसा उन्होंने अभिनय किया। किन्तु शरीर की स्थिति शव-जैसी होते हुए भी, भीतर 'मैं' का भान तो पूर्ववत् ही चालू रहा, इससे उन्होंने मन-ही-मन प्रश्न किया---'मैं' कौन ? और आवरण हट गया । उस समय की अपनी अनुभूति का ब्यौरा उन्होंने स्वयं इस प्रकार दिया है--- "मदुरा से सदा के लिए रवाना होने से पहले लगभग छह सप्ताह पूर्व मेरे जीवन में यह महान परिवर्तन आया । मेरे चाचा के मकान पर पहली मंजिल पर कमरे में मैं अकेला बैठा हुआ था। मुझे कभी कोई बीमारी नहीं हई थी, एवं उस दिन भी मेरा स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक था। किन्तु एकाएक मृत्यु के भीषण भय ने मुझे घेर लिया। मृत्यु के भय के आघात के कारण मैं अन्तर्मुख हुआ एवं मेरे मन में अनायास ही विचार उभरने लगे, 'अब मृत्यु आ पहुँची है । इसका अर्थ क्या ? मृत्यु किस की ? यह शरीर १. Proceedings and Transactions of the Royal Society of Canada Series II, Vol. 12, pp. 159-196. २. Dr. Richard Mau.ice Bucke, M. D., Cosmic Consciousness, p. 10 (E. P. Dutton and Co., Newyork.) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210037
Book TitleAnirvachaniya Anand ka Srot Swanubhuti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmrendravijay
PublisherZ_Sajjanshreeji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012028.pdf
Publication Year1989
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle & Inspiration
File Size913 KB
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