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________________ पालन नहीं करता वह भयंकर क्लेश और विषाद वैदिक परम्परा में भी अस्तेय पर पर्याप्त उठाता है । अतः संयमी साधक को ऊँची-नीची तथा विचार-विमर्श हुआ है। मनुस्मृतिकार यमों की तिरछी दिशाओं में जहाँ कहीं भी त्रस और स्थावर महत्ता बतलाते हुए कहते हैंप्राणी रहते हों-विचरते हों उन्हें संयम से रहकर यमान सेवेत सततं न नियमान केवलान बुधः। अपने हाथों से, पैरों से या किसी भी अंग से पीड़ा यमान पतत्य कुर्वाणो नियमान केवलान भजन ॥ नहीं पहुँचानी चाहिए। दूसरों की बिना दी हुई। अर्थात् बुद्धिमान व्यक्तियों को सतत यमों का वस्तु भी चोरी से ग्रहण नहीं करना चाहिए। सेवन (पालन) करना चाहिए, केवल नियमों का परवस्तहरण चौर्य कर्म है और इस कूटेव का नहीं क्योंकि नियमों का पालन करने वाला यमों पर सर्वथा परित्याग अचौर्य या अस्तेय है। अचौर्य या के पालन के अभाव में गिर जाता है। महर्षि पतंजलि अस्तेय का अर्थ चोरी न करना तो है ही परन्तु यह ने अपने 'योगसूत्र' के साधनपाद के सूत्र ३० में ! पद निषेधपरक ही नहीं है। इसकी विधिपरक अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्माचर्य को व्याख्या भी की जा सकती है। ईमानदारी, अधि- यम कहा है। यहां भी अस्तेय के ऊपर दो और कार और कर्तव्य के प्रति जागरूक रहकर उनका नीचे दो यम रखे गये हैं अर्थात् अस्तेय तृतीय स्थान सम्यक् उपभोग करना भी अचौर्य वृत्ति में सम्मि- पर ही रखा गया है। यम-नियम के पालन के बिना लित है। कोई भी साधनारत अभ्यासी योगी नहीं बन ____ अधिकारों का अपहरण, शोषण करना, सकता। योगाभ्यासी या अधिकारी ही नहीं वरन् दूसरों को अपना गुलाम (दास) बनाना, लोगों के इनका पालन सभी आश्रमवासियों के लिए आवस्वत्व छीनकर उन्हें अपने आदेश मनवाने हेतु बाध्य श्यक है। यमों का सम्बन्ध सम्पूर्ण मानव समाज करना आदि गर्हित कार्य स्तेय वृत्ति के ही उपजीवी पालन में सभी परहैं। किसी भी अवस्था में जीवनोपयोगी आवश्यक तन्त्र हैं। ये मानव के परम कर्तव्य हैं। इसीलिए मूल्यों का अपहरण न करना ही अस्तेय है। अगले इकत्तीसवें सूत्र में महर्षि पतंजलि ने इन यमों श्रमण परम्परा के दूसरे स्तम्भ बौद्ध धर्म में भी को जाति, देश, काल तथा समय (अवस्था विशेष पंचशील के अन्तर्गत अस्तेय की गणना की गयी है। या विशेष नियम) की सीमा से परे बतलाया है। अष्टांगिक आर्य मार्ग के पंचम सोपान की चर्चा इन्हें सार्वभौम महाव्रतों की संज्ञा दी गयी है। करते हुए बौद्ध धर्म में भी कहा गया है कि जीवन- आशय यह, कि यमों का पालन किसी जाति विशेष, यापन तथा जीवन-रक्षण हेतु मानव मात्र को किसी देश विशेष, काल विशेष या अवस्था विशेष के मानव | न किसी जीविका को अपनाना आवश्यक है किन्तु ममदाय के लिए नहीं वरन भ-मण्डल पर रहने वाले जीविका सम्यक होनी चाहिए। इससे न तो किसी समस्त मानव समाज के लिए इनका पालन करना प्राणी को किसी प्रकार का क्लेश पहुँचना चाहिए उपाय और अपरिहार्य है । यम का अर्थ ही शासन और न उनकी हिंसा। इसीलिए 'लक्खण सुत्त'- और व्यवस्था बनाये रखने वाले नियमों से है ! ३ में भगवान बुद्ध ने निम्नांकित जीविकाओं को अभाव सर्वदा भाव निरूपण के अधीन रहता है। गर्हणीय और हेय बतलाया है-तराजू की ठगी, इसीलिए सूत्र ३० की व्याख्या में भाष्यकार व्यास कंस की ठगी, मान की ठगी, रिश्वत लेना, वंचना, जी ने लिखा है, "अशास्त्रपूर्वकं द्रव्याणां परतः ) कृतघ्नता, डाका-लूटपाट आदि। इस धर्म में भी स्वीकरणं स्तेयम् । तत्प्रतिषेधः पुनरस्पृहारूपमस्तेयअस्तेय को पंचशीलों में तृतीय शील ही बतलाया मिति ।" स्तेय को परिभाषित करते हुए उसके प्रतिषेध को अस्तेय कहा है। स्तेय वृत्ति अशास्त्र३१८ चतुर्थ खण्ड : जैन संस्कृति के विविध आयाम गया है। 0 साध्वीरत्न कुसुमवती अभिनन्दन ग्रन्थ Jain Education International SN Private & Personal Use Only www.jainerairal y.org
SR No.210029
Book TitleAdattadan Virman ki Vartaman Prasangikta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBrajnarayan Sharma
PublisherZ_Kusumvati_Sadhvi_Abhinandan_Granth_012032.pdf
Publication Year1990
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle, Five Geat Vows, C000, & C001
File Size903 KB
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