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________________ वीरजिणिवचरित [ १. १०.५आघोसिउ णामें बढमाणु । जगि भणमि भडारउ कहु समाणु ।। जो पेक्खिवि णउ गंभीरु उयहि । जो पेक्खिविण थिर गिरिंटु समहि ॥ जो पेक्निवि चंदु ण कतिकंतु । जो पेविखवि सूरु ण तेयवंतु ।। मज्झत्थ-भाउ सुह-सुक-लेसु । णं धम्मु परिहिउ पुरिस-वेसु ।। बुझिय-परमक्खर-कारणेहि। ओ संजय-विजयहिं चारणेहिं । अवलोइर सेसवि देवदेउ । हउ भीसणु संदेह हे ॥ सम्मइ कोकिल संजम-धणेहिं। विरक्य-गुरु-विणय पयाहिणेहिं ।। अहिसेय-सलिल-धुय-मंदरेण । जो णिब्भउ भणि पुरंदरेण ।। तं णिसुणिवि देव संगमेण । होइवि भीमें उरजंगमेण ॥ णंदणवणि कीला-सरु णिरुधु । गय सहयर सिसु थिउ तिजगबंधु ॥ तहु फणि-माणिक्कई फसमाणु । अविउलु अचलु वि सिरि-वड्ढमाणु । धत्ता-फण-मुह-दाढाउ कर फुसंतु ण संकिउ । पुज्झिवि देवेण धीरणाहु तहि कोक्किउ ॥१०॥ दुवई-जे सिसुन्दसणेण रिउणो वि हु होति विमुक्क-मच्छरा। अस्स कुमार-काल-परिवट्टण वषय तीस वच्छरा ॥
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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