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________________ प्रस्तावना चम्पूकाव्य है और इसमें कई संस्कृत वृत्तका उपयोग हुआ है। इसका काल सन् १०४२ है | उसके बाद आचरणने 'वर्तमानपुराण' लिखा है । इनका सम्मानसूचक नाम वाणी वल्लभ था । यह एक चम्पू हैं और इसकी रचना संस्कृत काव्य शैली में हुई है। इसमें भी सोलह सर्ग है और कविने कई एक अलंकारों का उपयोग किया है । इसका काल लगभग सन् ११९५ है । पद्मकविले १५२७ में जनसाधारण शैली में सांगत्य छन्दमें 'वर्द्धमानचरित्र' लिखा है। इसकी बारह सन्धियाँ हैं । ( ट ) बौद्ध त्रिपिटक - पालि साहित्यमें महावीर وی जैन आगम ग्रन्थोंमें बुद्ध के कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलते। किन्तु बौद्ध त्रिपिटकमें 'निर्गठनातपुत' ( निर्ग्रन्थ ज्ञातृपुत्र ) के नामसे महावीर व उनके उपदेश आदि सम्बन्धी अनेक सन्दर्भ पाये जाते हैं । इनका पता लगभग सौ वर्ष पूर्व तब चला जब चन्दनकी पालि टैक्स्ट सोसायटी तथा सेक्रेट बुक्स ऑफ दी ईस्ट नामक ग्रन्यमालाओंमें बौद्ध एवं जैन आगम ग्रन्थोंका प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। डॉ. हर्मन याकोबीने आचारांग कल्पसूत्र, सूत्रलांग, उत्तराध्ययन सूत्रका अनुवाद किया ( से. बु. क्र. २२ व ४५ ) और उनकी प्रस्तावना में पालि साहित्यके उन उल्लेखोंकी ओर ध्यान आकृष्ट किया जिन्दमें निग्गंठनातपुत्त के उल्लेख आये हैं । तत्पश्चात् क्रमदाः ऐसे उल्लेखों की जानकारी बढ़ती गयी और अन्ततः भुनि नगराजजीने 'आगम और त्रिपिटक: एक अनुशीलन' शीर्षक ग्रन्थ ( कलकत्ता १९६९ ) में छोटे-बड़े ऐसे ४२ पालि उद्धरणोंका संकलन किया है जिनसे निस्सन्देह रूपसे सिद्ध हो जाता है कि दोनों महापुरुष सम-सामयिक थे, उनमें महावीर जेठे थे, तथा उनका निर्वाण भी बुद्ध पूर्व हो गया था। उन्होंने पूरी छान-चीन के पश्चात् वीर निर्वाण काल ई. पू. ५२७ ही प्रमाणित किया है । 1 १५. प्रस्तुत संकलन तीर्थकरोंके चरित्रसम्बन्धी अपभ्रंश साहित्य में प्राचीनतम रचना पुष्पदन्त कृत महापुराण हूँ। चूंकि इस ग्रन्थको रचना मान्यखेटमें उस समय हुई थी जब वहाँ राष्ट्रकूटनरेश कृष्णराज { तृतीय ) को राज्य था, तथा स्वयं कविके कथनानुसार उन्होंने उसकी रचना सिद्धार्थ संवत्सर में प्रारम्भ कर क्रोधन संवत्सर में समाप्त की थी, अतः उसका समासि काल शक ८८७ ( सन् १६५ ई. ) सुनिश्चित है । उप महापुराणको १०२ सन्धियोंमें से अन्तिम आठ अर्थात् ९५ से १०२वीं सन्धियोंमें भगवान् महावीरका जीवन चरित्र वर्णित है और उन्हीं में से प्रधानतया यह संकलन किया गया है। मूलमें विषय-क्रम इस प्रकार है- महावीरके जन्म से लेकर केवलज्ञान तककी घटनाएँ ( सन्धि ९५-९७ ), महावीरके आर्यिका संघको
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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