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________________ प्रस्तावना ६३ स्थान भगवान्का ज्ञान प्राप्ति क्षेत्र स्वीकार करके वह समुचित स्मारक बनाया खाना चाहिए । ११. महावीर देशना स्थल और उस नगर के समीप · केवलज्ञान प्राप्त करके भगवान् राजगृह पहुँचे विपूलाचल पर्वतपर उनका समवसरण बनाया गया। वहीं उनकी दिव्यध्वनि हुई जिसका समय श्रावण कृष्ण प्रतिपदा कहा गया है। इसके अनुसार भगवान्का प्रथम उपदेश केवलज्ञान प्रामिसे ६६ दिन पश्चात् हुआ। यह बात हरिवंशपुराण ( २,६१ आदि ) में निम्न प्रकार पायी जाती है : पट्षष्टिदिवसान् भूयो मोनेन विहरन् विभुः । आजगाम जगत् ख्यातं जिनो राजगृहं पुरम् ॥ आरुरोह गिरि तत्र विपुलं विपुलश्रियम् । प्रबोधार्थ स लोकानां भानुमानुदयं यथा ॥ श्रासने पति प्रभुः 1 प्रतिपद्य हि पूर्वाह्णे शासनार्थमुदाहरत् ॥ इस प्रकार बिहार राज्य के अन्तर्गत राजगृह नगर के समीप विपुलाचलगिरि ही वह पवित्र और महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है जहाँ भगवान् महावीरका दिव्य शासन प्रारम्भ हुआ । इस पर्वतपर पहले से ही अनेक जैन मन्दिर हैं, और कोई २५-३० * वर्ष पूर्व यहाँ चीर शासन स्मारक भी स्थापित किया गया था । तबसे वीरशासन - जयन्ती भी श्रावण कृष्णा प्रतिपदाको मनायी जाती है । सभापि उक्त स्मारक और पवित्र दिनको अभीतक वह देशव्यापी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हुई जो उनके ऐतिहासिक महत्व के अनुरूप हो । इस हेतु प्रयास किये जाने की आवश्यकता है, क्योंकि यही वह स्थल है जहाँ न केवल भगवान्‌का धर्म-शासन प्रारम्भ हुआ था, किन्तु उस समयके सुप्रसिद्ध वेद विज्ञाता इन्द्रभूति गौतमने आकर भगवान्का नायकत्व स्वीकार किया और वे भगवान् के प्रथम गणधर बने । यहीं उन्होंने भगवान् की दिव्यध्वनिको अंगों और पूर्वोके रूपमें विभाजित कर उन्हें ग्रन्थारूढ़ किया । यहीं मगधनरेश श्रेणिक बिम्बसारने भगवान्‌का उपदेश सुना और गौतम गणधर से धर्म-चर्चा करके जैन- पुराणों और कथानकों को रचनाकी नींव डाली । यहीं श्रेणिकने ऐसा पुण्यबन्ध किया जिससे उनका अगले मानव जन्ममें महापद्म नामक तीर्थंकर बनना निश्चित हो गया ।
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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