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________________ १० १५ २० २५ ३० १३२ वीरजिणिचरिउ ताहुँ चेटु जा होइ समासम । सा तद्दलिय - ग्रहण-भावक्खम ॥ जेम तेल्लु सिहि- सिह परिणाम | तेम कम्म पग्लु बि पिसामहु || जीवें लइयउ जाइ जियत्तहु । तिब्व-कमाय-रसेहिं पमत्तहु ॥ जिह सिहि भाव बबइ इंधणु । तिह कम्मेण जि कम्महु बंधणु || असु असु सु सु संघइ । सिद्ध भडारण किं पिण बंधइ || अभव जीव जिणणाहें इच्छिय । एकुण ते वि अगंत प्रियच्छिय ॥ मह-सु-ओहि मणपज्जव केवल । णाणावरण-विमुक्त सु-णिकल ॥ शिद्दाणि पलापयला | श्रीगिद्धि गिद्दा पुणु पयला ॥ चक्खु अचक्खु दंसणावरणउ | अवही केवल- दंसणवरणउ ॥ तेहिं विणा सिउ व संखायउ | वेयणीय- दुगु सायासायउ ॥ दंसण-मोहणीउ सम्मन्तु वि । मिच्छन्तु वि सम्मा-मिच्छन्तु वि ॥ दुविहु चरित- मोहु विक्खायउ | णो-कसाउ णामेण कसायउ || तं कसाय - जायड सोलह-विहु | इरु भणेमि पच्छद्द णत्र - बिहु || पढम-कसाय-चचक्कु सु-भीसणु | सत्तम-रव-गामि दिहि-दूसणु ॥ [ १२.५.५ पत्ता - अइ-कोहु समाणु माया लोहु वि दुत्थयरु | समहुँ जाइ जइ वि पबोहइ तित्थयरु ||५|
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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