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११.३.२० ]
हिन्दी अनुवाद
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हुई शिला पर आसीन हो गये । उस उपसर्गको धैर्य के साथ सहन करके वे मोक्षगामी और अशरीरी सिद्ध हो गये । उस समय उनके निर्वाण-उत्सवके लिए जो देवोंका आगमन हुआ, उसे देखकर बुद्धदास मन्त्रीके मनमें भी उपशम भाव उत्पन्न हो गया और वह जिन भगवान्का भक्त हो गया । राजा नरसिंह भी अपने गुणशाली पुत्र नरपालको राज्य समर्पित करके अन्य एक सहस्र राजाओंके साथ प्रबजित हो गये, और वे अपनी तपस्या द्वारा अत्यन्त प्रसिद्ध हुए। वे चन्द्रके समान उज्ज्वल - काय होते हुए, देवसमूहों द्वारा प्रशंसित होते हुए, यथासमय पापोंसे मुक्त होकर, ग्रैवेयक स्वर्ग में देव हुए ||३||
इति श्रेणिकसुत गजकुमारकी दीक्षा विषयक ग्यारहवीं सन्धि समाप्त ॥ सन्धि ११ ॥