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________________ ११.३.२० ] हिन्दी अनुवाद ११९ हुई शिला पर आसीन हो गये । उस उपसर्गको धैर्य के साथ सहन करके वे मोक्षगामी और अशरीरी सिद्ध हो गये । उस समय उनके निर्वाण-उत्सवके लिए जो देवोंका आगमन हुआ, उसे देखकर बुद्धदास मन्त्रीके मनमें भी उपशम भाव उत्पन्न हो गया और वह जिन भगवान्‌का भक्त हो गया । राजा नरसिंह भी अपने गुणशाली पुत्र नरपालको राज्य समर्पित करके अन्य एक सहस्र राजाओंके साथ प्रबजित हो गये, और वे अपनी तपस्या द्वारा अत्यन्त प्रसिद्ध हुए। वे चन्द्रके समान उज्ज्वल - काय होते हुए, देवसमूहों द्वारा प्रशंसित होते हुए, यथासमय पापोंसे मुक्त होकर, ग्रैवेयक स्वर्ग में देव हुए ||३|| इति श्रेणिकसुत गजकुमारकी दीक्षा विषयक ग्यारहवीं सन्धि समाप्त ॥ सन्धि ११ ॥
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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