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________________ 214 वर्धमानचम्पू: कौलेयस्तिष्ठति । नापि तदधिष्ठानाद् भक्त गृहीतम् यत्र मक्षिका भनभनायन्ते स्म । मत्स्या मया न भक्षिताः । प्रामिषं मया न सेवितम् । मदिरा मया न पीता । न गलितं पिशितं भक्षितम् । सुषानां मलीमसं सलिलं मया न पीतम् । एकस्मादेवालयादहं भोजनमलभे । एकग्रासप्रमाणं भोजनं मया लब्धम् । द्वाभ्यां गृहाभ्यां मया भोजनं लब्धम् । द्विग्रासप्रमितं भोजनं मया भुक्तम् । विवसे कदाचिदेकवारं भोजनं कृतम् । कदाचिच्च पंचदशदिवसेषु निर्गतेषु अपि भोजनं भक्षितम् । शिरश्चिबुकश्मश्रस्थाः केशा मया यथासमयं सर्वदेवोत्पाटिताः । सलिलस्यके बिन्नावप्यहं वयाशीलोऽभवम् । क्षुद्रजीवस्यापि भया घातो नो भवेवीदृशी सावधानता यतना वाहनिशं रक्षिता। लिया जिसके पास कुत्ता बैठा हो तथा जहां मक्खियां भनभना रही हों ऐसे स्थान से भी मैंने भोजन नहीं लिया । अपने आहार में मैंने मछलियों का मेबन नहीं किया, मांस नहीं खाया। शराब मैंने नहीं पी । सड़ा गला मांस मैंने नहीं खाया । धौन मैंने नहीं पिया। एक घर का भोजन मैंने लिया। एक ग्रासप्रमाण' मैंने भोजन लिया । दो घरों का भोजन मैंने लिया । दो ग्रासप्रमाण मैंने भोजन लिया । दिन में कभी मैंने एक बार भोजन लिया और कभी-कभी पन्द्रह दिनों के बाद भोजन लिया । शिर के केशों का मैंने मुञ्चन किया । दाढ़ी के बाल मैंने उखाई । पानी की एक बूंद पर भी मुझे दया ग्राती थी। मेरे द्वारा छोटे से भी छोटे जीव का पात न हो जाये ऐसी साबधानी और यतना प्रतिदिन-सर्वदा-रखी जातो थी । इस प्रकार गौतम बुद्ध ने पाहार के सम्बन्ध में अपने शिष्य को समझाया।
SR No.090531
Book TitleVardhamanchampoo
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMulchand Shastri
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year
Total Pages241
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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