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________________ [१७७ का विवेक छोड़कर योगी नाम से प्रसिद्ध होते हैं और 'जिन वाक्य' ने जिनके हृदय को स्पर्श नहीं किया हो उनके पास धर्म कहां ? उसका फल भी कहां ? फिर उनके धर्म की प्रामाणिकता ही क्या (श्लोक ३३१-३४७) जिन-प्रोक्त धर्म फल इहलोक व परलोक में मुक्ति या मोक्ष है जो कि सब में अन्तनिहित है। धान्य वपन करने पर उसके आनुषंगिक रूप में जैसे बिचाली तुष आदि प्राप्त होते हैं उसी प्रकार जिन-प्रोक्त धर्म के आचरण का मुख्य फल मोक्ष है इस लोक का सांसारिक सुख गौण है।' (श्लोक ३४८-३४९) ऐसा उपदेश सुनकर बहुत से लोगों ने श्रमण धर्म को अङ्गीकार कर लिया। द्विपृष्ठ और विजय ने सम्यक्त्व ग्रहण किया। दिन का प्रथम याम शेष होने पर प्रभु ने अपनी देशना समाप्त की। द्वितीय याम में उनके मुख्य गणधर ने संक्षिप्त देशना दी। देशना शेष होने पर प्रभु वहां से प्रव्रजन कर पृथ्वी पर विचरण करने लगे। तदुपरान्त इन्द्र, वासुदेव, द्विपृष्ठ, बलदेव और विजय स्व-स्व निवास को लौट गए। - (श्लोक ३५०-३५२) भगवान् वासुपूज्य के तीर्थ में ७२ हजार साधु, १ लाख साध्वियां, १ हजार २ सौ चतुर्दश पूर्वधर, ५ हजार ४ सौ अवधिज्ञानी, ६ हजार १ सौ मनःपर्यायज्ञानी, ६ हजार केवली, १० हजार वैक्रियलब्धि सम्पन्न, ४ हजार ७ सौ वादी, २ लाख १५ हजार श्रावक एवं ४३ लाख ६ हजार श्राविकाएँ थीं। केवलज्ञान से १ मास कम ५४ लाख वर्षों तक प्रभु ने इस पृथ्वी पर विचरण किया। (श्लोक ३५३-३५८) मुक्ति का समय निकट जानकर प्रभु चम्पा नगरी में लौट आए और वहां ६ सौ मुनियों सहित अनशन ग्रहण कर लिया । एक महीने के पश्चात् आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को चन्द्र जब उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र में था तब उन ६ सौ मुनियों सहित प्रभु मोक्ष पधार गए। प्रभु १८ लाख वर्षों तक कुमारावस्था में रहे, ५४ लाख वर्षों तक श्रमण रूप में रहे । अतः कुल ७२ लाख वर्षों तक पृथ्वी पर विचरण किया। श्रेयांसनाथ के ५४ सागर वर्ष पश्चात् वासुपूज्य स्वामी का निर्वाण हआ । इन्द्र और देवों ने प्रभु और अन्य मुनियों का यथोचित सत्कार किया। (श्लोक ३५९.३६३)
SR No.090515
Book TitleTrishashti Shalaka Purush Charitra Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGanesh Lalwani, Rajkumari Bengani
PublisherPrakrit Bharti Academy
Publication Year1992
Total Pages278
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, Story, & Biography
File Size21 MB
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