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त्रिपृष्ठकुमार ने कहा- 'तुम लोगों ने कोई अपराध नहीं किया है। प्रभु के आदेश पर युद्ध करना क्षत्रियधर्म है । अतः भय का परित्याग करो। आज से अब मैं तुम्हारा प्रभु हूं। मेरे अधीन रहते हुए तुम लोग अपने-अपने राज्य को लौट जाओ और सुखपूर्वक राज्य करो।'
(श्लोक ७५९-७६०) इस प्रकार समस्त राजाओं को आश्वस्त कर त्रिपृष्ठकुमार स्व-दलबल के साथ द्वितीय इन्द्र की तरह पोतनपुर लौट आए।
(श्लोक ७६१) वासुदेव और उनके अग्रज ने सप्त निधियां एवं चक्र से परिवृत्त होकर दिग्विजय के लिए पुनः पोतनपुर का परित्याग किया। प्रथम उन्होंने पूर्व प्रान्त के मुख के अलङ्कार तुल्य मगध को जय किया। तदुपरान्त दक्षिण प्रान्त के शिरमाल्य रूप वरदामपति और पश्चिम प्रान्त जिनके द्वारा अलंकृत हुआ था ऐसे प्रभासपति को जय कर लिया। वैताढ्य पर्वत की उभय श्रेणियों के विद्याधरों को भी उन्होंने जय कर लिया । ज्वलनजटी को विद्याधरों की उभय श्रेणियों का आधिपत्य त्रिपृष्ठकुमार ने प्रदान किया । महान् व्यक्तियों की सेवा करने पर वे कल्पवृक्ष की तरह फलदान करते हैं। इस प्रकार दक्षिणार्द्ध जय कर त्रिपृष्ठकुमार स्व-नगर लौट जाने को प्रस्थान किए। उस समय वे चक्रवर्ती के अर्द्ध वैभव और अर्द्ध पराक्रम से सुशोभित हो रहे थे। पथ अतिक्रम करते हुए वे मगध देश पहुंचे। राजाओं के तिलक रूप उन्होंने वहां पृथ्वी के तिलक रूप जिसे एक करोड़ लोग उठा सकें ऐसी शिला देखी । उन्होंने उस कोटि शिला को लीलामात्र में उठाकर बाएँ हाथ से सिर पर छत्र की तरह धारण की। उनकी इस अपरिमित शक्ति को देखकर राजागण और जन-साधारण आश्चर्यचकित होकर भाट
और चारणों की तरह उनके बल की प्रशंसा करने लगे । उस कोटि शिला को पुन: अपने स्थान पर रखकर वे श्री के निवास रूप पोतनपुर से कुछ दिन में ही लौट आए। (श्लोक ७६२-७७१)
त्रिपृष्ठकुमार ने हस्तीपृष्ठ पर आरोहण कर परिपूर्ण वैभव सहित श्री के नव निमित्त निवास रूप पोतनपुर में प्रवेश किया। आकाश के नक्षत्र की तरह समस्त नगर में मोतियों के स्वस्तिकों की रचना की गई। ध्वज-पताकाओं से सुसज्जित नगरी को देखकर