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लगे । ये बृद्ध श्रावक अर्थ पूजा के लोभी बनकर नए-नए शास्त्रों की रचना करने लगे और दान का महत्त्व बढ़ा-चढ़ाकर कहने लगे । तदुपरान्त वे आचार्य होकर कन्यादान, भूमिदान, लौहदान, वस्त्रदान, गोदान, स्वर्ण रौप्यदान, आसन, शय्या, अश्व, हस्ती एवं अन्य नानाविध दानों की व्याख्या की और प्रत्येक दान इहलोक और परलोक में महाफलदायी होगा, कहने लगे । मन्द बुद्धि और महालोभी बनकर वे बोले कि दान ग्रहण के केवल वे ही अधिकारी हैं अन्य कोई नहीं है । मायावादी वे लोगों के गुरु बन गए । जहां वृक्ष नहीं वहां लोग तिल के पौधे के ही चारों ओर वेदी निर्मित करते हैं | (श्लोक १५३-१६२) इस प्रकार भरत क्षेत्र में शीतलनाथ स्वामी के संघ स्थापन के पूर्व संघ विच्छेद हो गया । रात्रि में उल्लू के राजत्व की तरह उस समय ब्राह्मणों का एकच्छत्र राज्य स्थापित हो गया । इस प्रकार शान्तिनाथ भगवान् के पूर्व अन्य छह बार श्रमण धर्म का विच्छेद हुआ । इससे असंयत अविरतों की पूजा होने लगी । (श्लोक १६३-१६४)
सप्तम सर्ग समाप्त
अष्टम सर्ग
चन्द्र किरण जिस प्रकार कुमुदिनी को विकसित करती है उसी प्रकार जिन भगवान् शीतलनाथ के चरणयुग्म तुम्हें मोक्षमार्ग के लिए उद्बोधित करें । त्रिलोक के कषाय को शीतल करने वाले भगवान् शीतलनाथ स्वामी का जीवन मैं विवृत करूँगा ।
( श्लोक १-२ )
पुष्करवर द्वीपार्द्ध के पूर्व विदेह में वत्स नामक देश की अलंकार तुल्या सुसीमा नामक एक नगरी थी । राजा का नाम था पद्मोत्तर | अनुत्तर विमान के देवों की तरह वे नृपोत्तम थे । उनका आदेश कभी अमान्य नहीं होता था । वे समस्त जीवों के प्रति करुणा-सम्पन्न थे । उनमें दो भाव विराजते थे - वीरत्व और शान्त रस । राजा जिस प्रकार क्रोध के प्रति जागरूक रहता है और नाना प्रकार से उसे वर्द्धित करता रहता है उसी भांति वे धर्म के प्रति