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________________ २९६ ] तिलोयपण्णत्ती [ गाथा : १०५ - १०८ अर्थ :- नागेन्द्रोंके अभ्यन्तरादिक तीनों प्रकारके पारिषद देवोंमें क्रमश: दोसी, एक्सो साठ और एक्सौ चालीस देवियां होती हैं । ११०४ ।। सट्टी जुदमेवक-सयं चालीस जुदं च वीस अम्भहियं । refsari श्रभंतरादि-ति-परिस- देवी १६० । १४० । १२० । अर्थ :- गरुडेन्द्रों के अभ्यन्तरादिक तीनों पारिषद देवोंके क्रमश: एक्सौ साठ एक्सौ चालीस और एकसी बीस देवियाँ होती हैं ॥ १०५ ॥ चालुतरमेक्कसय बीसन्भहियं सयं च केवलयं । सेसिदाणं' श्रादिम-परिस-प्पहूदीसु देवीओ ॥१०६॥ ॥ १०५॥ १४० | १२० | १०० अर्थ :- शेष इन्द्रों के आदिम पारिषदादिक देवोंमें क्रमश: एक सौ चालीस एकसौ बीस और केवल सौ देवियां होती हैं ।। १०६॥ । उदहि पहुदि कुलेसु इदारणं दोष- इंद-सरिसाओ । श्रादिम-मज्झिम- बाहिर परिसत्तिवयस्स देवीश्री ॥ १०७ ॥ १४० । १२० । १०० अर्थ : - उदधिकुमार पर्यंत कुलोंमें द्वीपेन्द्रके सदृश १४०, १२० और १०० देवियाँ क्रमशः आदि, मध्य और बाह्य पारिषादिक इन्द्रोंकी होती हैं ||१०७ || श्रसुरादि-दस- कुलेसु हवंति पण्णासा देवीयो सयं च देवोंके सी देवियाँ होती है ॥ १०५ ॥ । ५० । १०० | अर्थ :- श्रसुरादिक दस कुलों में सेना सुरोंमेंसे प्रत्येकके उत्कृष्टत: पचास और महत्तर १. ब. ब. क. ज. 5. देविदास सेणा - सुराण पत्सेवकं । परो महत्तर - सुराणं ॥ १०८ ॥
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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