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________________ गाथा : ११०-११२ ] fagu महाहियारो [ १७९ विशेषार्थ :- सीमन्त बिलका विस्तार ४५०००००–६१६६६४४०८३३३३ योजन विस्तार निरय इन्द्रका है । तेनाल लक्खारिंग - सोलस-सह- सट्ठी 1 दु-ति- भागो वित्थारो 'रोरुग- णामस्स गावच्यो ।। ११० ।। ४३१६६६६३ । अर्थ :- रौरुक ( रौरव ) नामक तृतीय इन्द्रकका विस्तार तैंतालीस लाख, सोलह हजार बहस छ्यासठ योजन और एक योजनके तीन भागों में से दो भाग प्रमाण जानना चाहिए । ११० ।। विशेषार्थ : - ४४०८३३३३ – ६१६६६३ - ४३१६६६६३ योजन विस्तार तृतीय रौरुक इन्द्रकका है पणुवीस - सहस्सा हिय - जोयरण - बादाल - लक्ख परिमाणो । भतिदयस्स भणिदो वित्थारो पढम- पुढवीए ॥ १११ ॥ ४२२५००० । अर्थ :- पहली पृथिवीमें भ्रान्त नामक चतुर्थ इन्द्रकका विस्तार बयालीस लाख, पच्चीस हजार योजन प्रमाण कहा गया है ।।१११|| विशेषार्थ : – ४३१६६६६३ – ९१६६६३ = ४२२५००० योजन विस्तार भ्रान्त नामक चतुर्थ इन्द्र बिलका है । एक्कत्तालं लक्खा तेत्तीस - सहस्स ́-ति-सय-तेत्तीसा । एक्क-कला ति-विहत्ता उभंतय-रुंद परिमाणं ।। ११२ ।। ४१३३३३३३ | अर्थ : – उद्भ्रान्त नामक पाँचवें इन्द्रकके विस्तारका प्रमाण इकतालीस लाख, तैंतीस हजार तीनस तैंतीस योजन और योजनके तीन भागों में से एक भाग है ।।११२।। विशेषार्थ :- ४२२५००० - ९१६६६१ = ४१३३३३३३ योजन विस्तार उद्भ्रान्त नामक पाँचवें इन्द्रक बिलका है । १. द. ब. क. वित्थारा । २. द. लोगणामस्स । ३. द. गावच्या | ४. द. तीससइसगं ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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