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________________ १६० ] तिलोयपण्णत्ती [ गाथा : ६६-६८ विशेषार्थ :-जैसे—प्रथम पृ० के इन्द्रक १३ – १ = १२, १२ : २-६, ६x६=३६ वगं फल, ३६+६ मूलराशि = ४२, ४२४ ६ = ३३६, २३६ + ५०-३४१, ३४५४ १५ इन्द्रक संख्या= ४४३३ प्रमारण प्रथम पृ० के इन्द्रक सहित धेरणीबद्ध बिलोंका प्राप्त हुआ। समस्त पृथिवियोंके इ. द्रक एवं श्रेणीबद्ध बिलोंकी संख्या पढमा' इंवय-सेढी चदाल-सयाणि होति तेत्तीसं । छस्सय-दुसहस्साणि पणणउदी बिदिय-पुढवीए ॥६६॥ ४४३३ । २६६५ । प्रपं:-पहली पृथिवीमें इन्द्रक और श्रेणीबद्ध बिल चार हजार चार सौ तेतीस हैं और दूसरी पृथिवीमें दो हजार छह सौ पंचानवे ( इन्द्रक एवं श्रेणीबद्ध बिल ) हैं ॥६६॥ विशेषार्थ :-( १३ – १-१२): २-६ । (६४६ = ३६ )+६ - ४२ । ४२ x ५= ३३६ । ( ३३६+५==३४१) ४ १३=४४३३ पहली पृ० के इन्द्रक और श्रेणीबद्ध बिलोंका प्रमाण है। ( ११ --- १ - १०): २=५ । (५४५-२५)+५=३० । ३०४८=२४० । ( २४०+५=२४५) x ११= २६९५ दूसरी पृ० के इन्द्रक + श्रेणीबद्ध । · तिय-पुढवोए इंदय-सेढी चउदस-सयाणि पणसीदी । सत्तुत्तराणि सत्त य सयारिंग ते होति तुरिमाए ॥६७॥ १४८५ १७०७ अर्थ :-तीसरी पृथिवीमें इन्द्रक एवं श्रेणीबद्ध बिल चौदहसौ पचासी और चौथी पृथिवीमें सातसौ सात हैं ।।६।। विशेषार्भ :-( ६ – १-८): २=४ । ( ४४४=१६)+४-२० । २०४८ १६०, ( १६० + ५)x६= १४८५ तीसरी पृ० के इन्द्रक और श्रेणीबद्ध । पणसट्ठी दोषिण सया इंदय-सेढीए पंचम-खिदीए । तेसट्टी छठीए चरिमाए पंच गादत्वा ॥६॥ २६५ । ६३ । ५। . .--. . - - ---- - १. ब. पुढमा। २. द. बद्धस्स ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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