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________________ ५८ ] तिलोयपणाती [ गाथा : १६०-१६१ [(+):२४१४७]-3= घनराजू अभ्यन्तर क्षेत्रका घनफल । विशेषार्य :–पाँचवीं पृथिवी पर च छ छे चे क्षेत्रका धनफल इसप्रकार है --भुजा छ छे ७ और प्रतिभुजा च च । है, दोनोंका योग (+3)- है । इसमें पूर्वोक्त क्रिया करनेपर (3xx १४७)- अर्थात ३३ धनराज घनफल पंचम पृथिवीका प्राप्त होता है । ___चौथी पृथिवी पर ग घ च चे ग बाह्य और अभ्यन्तर क्षेत्रसे मिश्रित क्षेत्रका ( बाह्यक्षेत्रका एवं अभ्यन्तर क्षेत्रका भिन्न-भिन्न) घनफल इसप्रकार है-च = 3 और चे च = है, प्रतः (+3) भुजा है तथा ग गे= प्रतिभुजा है। +- राजू प्राप्त हुआ। भxx १४७=११ धनराजू वाह्याभ्यन्तर दोनोंका मिश्रघमफल होता है। इसमें से बाह्य त्रिकोण क्षेत्रका घनफल (ixxॐx७) घनराजू घटा देनेपर (१५-१)= धनराजू ग घ चे चेंगे अभ्यन्तर क्षेत्रका घनफल प्राप्त होता है । रज्जु-धरणद्ध णव-हद-तबिय'-खिदीए दुइज्ज-भूमीए । होदि दिवड्ढा एदो मेलिय दुगुणं घरपो कुज्जा ॥१०॥ मेलिय दुगुणिदे ३४३ ६३/ 'तेत्तीसब्भहिय-सयं सयलं खेत्तारण सय्व-रज्जुघणा । ते से सव्वे मिलिदा दोणि सया होति चउ-हीणा ॥१६१॥ । १३३ मिलिदे १३ १६६/ अर्थ :-अर्थ (३) घनराजूको नो से गुणा करनेपर जो गुणनफल प्राप्त हो, उतना तीसरी पृथिवी-पर्यन्त क्षेत्रके घनफलका प्रमाण है और दूसरी पृथिवी पर्यन्त क्षेत्रका घनफल डेढ़ घनराजू प्रमाण है। इन सब घनफलोंको जोड़कर दोनों तरफका घनफल लानेके लिए उसे दुगुना करना चाहिए ।। १६०|| [ +3)२४१४७] = ० रा०; : २४१४७-३ घनराजू । योग- +:++ ++ + +:+३-१ 2x320" =६३ धनराजू । १. द. ब. तदीय । २. ब. तेत्तीससबभहिय छेत्ताण । द ज. के. ठ. तेसीसभहिय सयं सयवेत्ताण ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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