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________________ गाथा : १६४-१६६ ] पढमो महाहियारो [ ४३ (सर्वार्थसिद्धि विमानके ध्वजदण्ड) से २६ योजन ४२५ धनुष ऊपर जाकर लोकका अन्त है; इसीलिए गाथामें कल्पातीत भूमिका अन्त लोकके अन्तसे किंचित् ( २६ यो. ४२५ ध. ) कम कहा है। अधोलोकके मुख मीर भूमिका विस्तार एवं ऊँरी सेढीए सत्तंसो हेट्ठिम-लोयस्स होदि मुहवासो । भूमी - वासो सेढी-मेला' - श्रवसाण - उच्छे हो 1—1—15 ।। १६४।। अर्थ :- अधोलोकके मुखका विस्तार जगच्छ्रेणीका सातवाँ भाग, भूमिका विस्तार जगच्छ्रेणी प्रमाण और अधोलोकके अन्त तक ऊँचाई भी जगच्छ रखी प्रमारण ही है ।। १६४।। विशेषार्थ :- अधोलोकका मुख विस्तार एक राजू, भूमि विस्तार सात राजू और ऊँचाई सात राजू प्रमाण है । अधोलोकका घनफल निकालने की विधि मुह-न- समासमद्ध गुणिदं पुण तह य वेदेण । धरण- घरिदं गादव्वं वेत्तासण-सण्णिए खेत्ते ।। १६५ ।। अर्थ : मुख और भूमिके योगको आधा करके पुनः ऊँचाईसे गुणा करनेपर वैवासन सदृश लोक ( अधोलोक ) का क्षेत्रफल जानना चाहिए ।। १६५ ।। विशेषार्थ :- ग्रधोलोकका मुख एक राजू और भूमि सात राजू है, इन दोनोंके योगको दो से भाजित कर ७ राजू ऊँचाईसे गुणित करनेपर अधोलोकका क्षेत्रफल प्राप्त होता है । यथा१+७=८, ८÷२=४, ४ x ७ राजू ऊँचाई = २८ वर्ग राजू अधोलोकका क्षेत्रफल प्राप्त होता है । पूर्ण अधोलोक एवं उसके अर्धभाग के घनफलका प्रमाण हेट्टिम - लोए लोन चउ-गुरिंग दो सग हिवो य विदफलं । तस्सद्ध" सयल-जगो दो-गुणिदो सत्त पवित्तो ॥ १६६ ॥ 3 |5×15 | ४ १. द. मेत्ता उच्छे हो । २. द व समासमद्दिय | ३. ब. तस्थद्ध सयल-जुदागो । क. ज. ठ. सत्तपरिमाणो । ४. द. बॅ.
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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