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________________ " तत्त्वार्थ राजवातिक " - दिगम्बराम्नाय में सर्वार्थसिद्धि ' के बाद में रची हई कृतियोंमे यह ‘वार्तिक ' अतीव मान्यताप्राप्त महान ग्रंथ है। जैनताकिकप्रवर श्री अकलंकदेवने इसकी रचना की है। तत्त्वार्थसूत्र की व्याख्या करनेवाले सभी ग्रथकार जैसे- समन्तभद्रकी । आप्तमीमांसा', दूसरी व्याख्या 'अष्टसहस्री '. 'लघीयस्त्रय ' आदि सभी न्याय ग्रंथोंके रचयिता इस वार्तिकसे प्रभावित हैं। अकलंकदेवके इस व्याख्यानके महत्त्वके बारेमे मान्य न्यायाचाय पंडित दरबारीलाल जी कोठिया की बातका उल्लेख करना उचित होगा। 'आप्तपरीक्षा' वीर सेवा मन्दिरप्रकाशनकी प्रस्तावनामे पृष्ठ २४ में वे कहते हैं कि 'विद्यानन्द' को यदि 'अकलंकदेव' का 'तत्त्वार्थवातिक' न मिलता तो उनके ' श्लोकवार्तिक ' में वह विशिष्टता न आती जो उसमे है । तत्त्वार्थ इलोकवातिक अकलंकदे के राजवातिक व्याख्याके बाद विद्यानन्दी आचार्य का । तत्त्वार्थश्लोकवातिक' दिगम्बराम्नायमे अपार जनमान्यता प्राप्त महान ग्रंथ माना जाता है। इस वातिकके आद्य मंगल श्लोकमे लिखा है'प्रवक्ष्यामितत्त्वार्थश्लोकवातिकम् ' इसीसे सूचित होता है कि यह तत्त्वार्यसूत्र के श्लोकरू पी वार्तिक है। मगर कहीं कहीं श्लोकोंके बीचमे सूत्रोंके विवरणरूपने गद्य व्याख्यान भी विद्यमान हैं। इसमे कोई शक नहीं कि यह स्वयं विद्यानंदजीकी रचना है। तत्त्वार्थसुत्र के अनुसार · अध्याय' नामक विभागोंमे अलावा, 'व्याख्यानवीशदीकरण' ( स्पष्टीकरण ) के अन्तमे 'आहि नकम् ' नामक विभाग भी जुड़े हुए हैं। इन विभागोंकी समाप्ति पर 'इति तत्त्वार्थ श्लोकवातिकालंकारे आहि नकम् ' प्रशस्ति भी लिखी गई है। इससे पता लगता है कि इस व्याख्यानका श्लोकवार्तिक' का दूसरा नाम श्लोकवातिकालंकार भी रहा होगा। अनुमान होता है कि श्लोक तथा गद्य व्याख्यान दोनोंको मिलाकर इसका नाम श्लोकवाति कालंकार' रखा होगा। यह व्याख्यान ताकिकशैलीमे बहुत ही प्रौढ तथा गहन है। विद्यानन्दोके असाधारण 'आगमपांडित्य' तथा दिगम्बर मुनियोंकी आचारनिष्ठा का यह एक ज्वलंत साक्षी' है। इस व्याख्यानके बारेमे सन्मान्य न्यायाचार्य पं दरबारीलालजी जैन कोठियाके वक्तव्यका यथावत उल्लेख विज्ञ पाठकोंके समक्ष रखना अतीव लामप्रद होगा । देखिए 'तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक ( पृष्ठ ४५२ ) में तत्त्वार्थसूत्रके छठे अध्यायके ग्यारहवें सूत्रका व्याख्यान करते हए जब उन्होंने दुःख शोक, आदि असातावेदनीयरूप पापास्रवके कारणोंका समर्थन किया, तब उनसे कहा गया कि जैन मुनि कायक्लेषादि दुश्चर तपोंको तपते हैं- और उस हालतमे उन्हें उनसे दुःखादि होना अवश्यम्भावी है। ऐसी दशामे उनको भी पापास्रव होगा। अत: कायक्लेशादि तपोंका उपदेश यक्त नहीं है और यदि युक्त हैं तो दुःखादिको पापात्रत्रका कारण बतलाना असंगत है ? इसका विद्यानन्दी अपने पूर्वज पूज्यपाद, अकलंकदेव आदिकी तरह ही आर्षसम्मत उत्तर देते हैं कि जैन मनियोंको कायक्लेषादि तपश्चरण करनेमे द्वेषादि कषायरूप परिणाम उत्पन्न उत्पन्न नही होते, बल्कि उसमे उन्हें प्रसन्नता होती- उसे भार और आपद मानते है उन्हीं के वे दुःखादिक पापास्रवके कारण हैं । यदि ऐसा नहीं हो तो स्वर्ग और मोक्ष के जितने भी साधन है वे सब ही दःखरूप है और इसलिए सभीको उनके पापास्रवका प्रसंग आवेगा । तात्पर्य यह है कि सभी दर्शनकारोंने यम, नियमादि विभिन्न साधनोंको स्वर्ग-मोक्षका कारण बतलाया है और वे यम नियमादि दुःखरूप ही है तब जैनेतर साधुओंके भी उनके आचरण से पापबंध प्रसक्त होगा । अतः केवल दुःखादि पापास्रवके कारण नहीं है अपि तू संक्लेश परिणामवुक्त दुःखादिक ही पापास्रवके शारण है । दूसरे तपश्चरण करनेमे जैन मुनिके मनोरति-आनन्दात्मक परम समता रहती है, बिना उस मनोरतिके वे तप नहीं करते और मनोरति सुख है । अत: जैन मनिके लिए कायक्लेषादिक तपश्चरणका उपदेश प्रयक्त नहीं है ।
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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