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________________ ३९४) तत्त्वार्थश्लोकवातिकालंकारे कर लेवें । इसके आगे भगवती आराधनाकी संस्कृत टीका अर्थसहित देशभाषाकारकें द्वारा दिखाई गई है। मेरी बुद्धि अनुसार अपराजितसूरि दिगम्बराचार्य हैं। उन्होंन भगवती आराधना की संस्कृत टीकामें बहुत बढिया अचेलताका सयुक्तिक समर्थन किया है और श्वेताम्बर ग्रन्थोंसेही अचेलताको समझा कर पुष्ट किया है। श्वेताम्बरोंक पूर्वपक्ष उठाये गये हैं, उनका महती विद्वत्तासे उत्तरपक्ष किया गया है, सम्भव है । पण्डित सदासुखजीकी अपराजितसूरिकी इस " आयिकाणामागमेऽनुज्ञातं वस्त्रं कारणा. पेक्षया, भिक्षूणां -हीमानयोग्य शरीरावयवो दुश्चर्माभिलम्बमान बीजो वा परीषहसहने वा अक्षमः सगृण्हाति " पंक्तिका अर्थ यह जंच गया होय कि भिक्षुक लज्जा या परीषहोंको नहीं सहनेपर वस्त्रोंको ग्रहण कर लेता है। किन्तु यह पंक्ति तो विशेष परिस्थिति उपस्थित हो जानेपर श्वेताम्बरोंके मतानुसार वस्त्रका ग्रहण कह रही है। यह दिगम्बरोंका सिद्धान्त न समझ लिया जाय । अपराजित सूरि या दिगम्बर शासन वस्त्रग्रहणको पुष्ट नहीं करते हैं। अपराजितसूरि ती बड़े उत्साहपूर्वक अचेलतापर झुके हुये हैं । अब रही श्लोकवात्तिककी बात कि"यह व्याख्यान अपवादरूप समझना चाहिये" । उसका अभिप्राय यही है कि आचार्यने लज्जा, त्रिस्थानदोष आदि सबका पर्यवेक्षण कर निर्दोष पुरुषको जिनदीक्षा दी थी। किन्तु जो पुनः निर्बलतावश कर्मपरतन्त्रतासे लज्जा' शील या शीतबाधाको नहीं सहनेवाला अथवा त्रिस्थानदोषी हो गया है। वह अपवाद मार्ग अनुसार वस्त्रको ग्रहण कर लेवे । संयमसे च्युत हो जाय किन्तु सम्यग्दर्शनसे भ्रष्ट न होय । पुनः बलवान आत्मा होकर उत्सर्गमार्ग आचेलक्यको धारण करता हआ मोक्षमार्गमें लग बैठे। तभी तो आगे चलकर "जैनाभासाः केचित् सचेलत्वं मुनीनां ख्यापयन्ति" तन्मिथ्या साक्षान्मोक्ष कारणं निर्ग्रन्थालगं, ग्रन्थकारने इस पंक्ति द्वारा जैनाभासोंक माने गये सचेलत्वको मिथ्या ठहरा कर मोक्षका कारण निर्ग्रन्थ लिंगही माना है । पंडित आशाधरजीने भी भगवती आराधना' की टीकामें निर्वस्त्रत्वको बहुत बढिया पुष्ट किया है । मुनिके पात्र, दण्ड, आदिका तो परिपूर्ण रीत्या परित्याग समझो ही। यों " भगवती आराधना” और उसकी अपराजितसूरि कृत विजयोदया टीका तथा आशाधर कृत मूलाराधना टीका एवं श्लोकवात्तिक और उसके भाष्यका पूर्वापर संदर्भ मिलाकर विद्वान् पुरुष पर्यवेक्षण करे । उनको सर्वत्र साधुके निर्वस्त्रत्व या निष्परिग्रहत्व गुणका समर्थन मिलेगा । “अलमेतद्विषयकवावदूक तया नमोऽस्तु दिगम्बरमुनिभ्यः ।"
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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