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________________ तस्वार्थ श्लोकवार्तिके मुनियोंका गुण क्षयोपशमिक संयम हैं। यहां चारित्रकी सर्वबातिप्रकृति अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्या नावरण और प्रत्याख्यावरण इनका क्षय और उपशम है, तथा देशघाति संज्वलन और यथायोग्य नोका कर्मप्रकृतियोंका उदय है । पांचवें गुणस्थान में चारित्रगुणका परिणाम हो रहा, संयमासंयम भी देशवतीका गुण है, यहां अनन्तानुबन्धी और अप्रत्याख्यानावरण प्रकृतियां तो संयमासंयम गुणकी सर्वघाती हैं । प्रत्याख्यानावरण देशघाती हैं। फिर भी प्रत्याख्यानावरण के तीव्र शक्तित्राले स्पर्धकों का पांचवें गुणस्थान में उदय नहीं है । किन्हीं किन्हीं उत्कट शक्तित्राले प्रत्याख्यानावरण स्पर्धकोंका तो चौथे गुणस्थान में भी उदय नहीं है, जो कि अनन्तानुबन्धी के सहचारी हैं । इस सूत्र के आदि वाक्य का योगविभागपूर्वक भेद करदेनेसे उक्त प्रकारका विवेचन कर दिया गया है । यह तीसरे प्रश्नका उत्तर हुआ । भावार्थ - चारित्रमोहनीयकर्मके क्षय, उपशम और क्षयोपशमसे उत्पन्न हुये महाव्रती और अणुवतियोंके क्षायिक चारित्र, उपशमचारित्र, और क्षयोपशम चारित्र इन तीन गुणों को बहिरंगनिमित्तकारण अपनाता हुआ अत्रविज्ञान अपने अवधिज्ञानावरणकर्मके क्षयोपशमस्वरूप एक अन्तरंगकारण से उपज जाता है। चौथे गुणस्थानवाले ममुष्य या तिर्थचके भी प्रशम, संवेग आदिक गुणोंके विद्यमान रहने के कारण चारित्रमोहनीयका क्षयोपशम यहांके लिये कल्पित कर लिया जाता है। तभी तो व्रत नहीं होते हुए भी पाक्षिक श्रावक के पांचवां गुणस्थान मान लिया गया है। चौथे गुणस्थान में हो रहा, अप्रत्याख्यानावरणका मन्द उदय तो अवधिज्ञानके उपयोगी क्षयोपशमको बनाये रहने देता है । जैसे कि सर्वघाती भी प्रत्याख्यानावरण के उदयने संगमासंयमको अक्षुण्ण बनाये रक्खा है । बिगाड़ा नहीं है । क्षयनिमित्तोऽवधिः शेषाणामुपशमनिमित्तः क्षयोपशमनिमित्त इति वाक्यभेदात्क्षाविकोपशमिकक्षायोपशमिकसंयमगुणनिमित्तस्यावधिरवगम्यते । कार्ये कारणोपचारात् क्षयादीनां क्षायिक संयमादिषूपचारः तथाभिधानोपपत्तेः । देव और नारकियोंसे अवशिष्ट हो रहे किन्हीं मनुष्यों के क्षयको बाह्य निमित्त मानकर अवधि होती है, और किन्हीं मनुष्यों के उपशमको बहिरंगनिमित्त कारण मानकर अवधिज्ञान हो जाता है। तथा कतिपय मनुष्य तिर्यंचोंके क्षयोपशमस्वरूप बहिरंगकारणसे अवधिज्ञान हो जाता है । इस प्रकार सूत्रस्थ क्षयोपशम इस वाक्यके तीन भेद कर देनेसे क्षायिकसंयम, औपशमिकसंयम और क्षायोपशमिक संयम इन तीन गुणोंको बहिरंगनिमित्त रख रहे जीवोंके अवधिज्ञान होना समझ किया जाता है। कार्य कारणका उपचार हो जानेसे क्षय, उपशम आदि कर्मसम्बन्धी भावोंका क्षायिकसंगम, उपशमसंयम और क्षायोपशमिकसंयम इन तीन संयमी आत्माके गुणोंमें उपचार कर लिया गया है । तिस प्रकार कथन करना युक्तियोंसे सिद्ध है । " आत्मा वै " पुत्र: " आप्तोच्चारितः शङ्खः प्रमाणम् " आदि स्थलोंपर कार्यमें कारण के धर्मोका या कारणमें कार्यके धर्मोका अधिष्ठान किया गया है । कोई नवीन बात नहीं है । बम्बई में कलकत्ताकी रेल गाडी आ जानेपर कलकत्ता । १२
SR No.090498
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 4
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1956
Total Pages598
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size17 MB
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