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________________ १.२ तत्वार्थ लोकवार्तिके 1 केवलज्ञान है, जो सम्पूर्ण पदार्थोंका युगपत् साक्षात् प्रतिभास कर देता है । और जो ज्ञान क्रम से होनेवाले हैं, वे भी तस्त्रज्ञानस्वरूप होते हुये प्रमाण हैं । स्याद्वादनीतिसे संस्कृत होता हुआ श्रुतज्ञान भी प्रमाण है। अथवा " स्याद्वादनयसंस्कृतं " यह विशेषण सभी तत्वज्ञानों में लगा लेना चाहिये । सप्तभंगी प्रक्रिया सर्वत्र सुलभ है। यहां उक्त कारिका के पूर्वार्धसे केवलज्ञानका प्रमाणपना खानते हुये वे विद्वान् कारिकाके " क्रममावि च यज्ज्ञानं स्याद्वादनयसंस्कृतं " इस उत्तरार्द्ध करके केवल आगमस्वरूप श्रुतज्ञानको दूसरे प्रमाणपनेका वचन है, ऐसा कहते हैं। किन्तु ऐसा व्याख्याम करनेपर इस कारिकामें मतिज्ञान और देशप्रत्यक्षस्वरूप अवधिज्ञान, मन:पर्यय ज्ञानोंका प्रमाणपना यह नहीं कहा गया समझा जायगा और तिस प्रकार केवलज्ञान और श्रुतज्ञान इन दो ज्ञानोंका ही प्रमाणपना श्री समन्तभद्रस्वामीकी कारिकाद्वारा व्यवस्थित हो जानेपर तस्वार्थसूत्रकारद्वारा कहे गये मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये पांच ज्ञान प्रमाण हैं । तथा वे ज्ञान प्रत्यक्ष और परोक्ष इन दो प्रमाण स्त्ररूप हैं। इस प्रकार पांचों ज्ञानों को दो प्रमाणस्वरूपपना प्रतिपादन करनेवाले सूत्रों करके बाधा हो जानेका प्रसंग प्राप्त हो जावेगा । यदा तु मत्यादिज्ञानचतुष्टयं क्रमभावि केवलं च युगपत्सर्वभासि प्रमाणं स्याद्वादेन प्रमाणेन सकलदेशिना नयौश्च विकलाशिभिः संस्कृतं सकलविप्रतिपत्तिनिराकरणद्वारेणागतमिति व्याख्यायते तदा सूत्रबाधा परिहृता भवत्येव । किन्तु जब श्री समन्तभद्रस्वामीकी कारिकाका अर्थ यों किया जायगा कि " क्रमक्रमसे होने वामति श्रुत आदिक चारों ज्ञान और एक ही समय में सत्र पदार्थोंको प्रकाशनेवाला केवळ ज्ञान प्रमाण हैं । वस्तुके सकल अंशोंका कथन करनेवाले स्याद्वाद प्रमाणकरके और वस्तुके विकल अंशोंका कथन करनेवाले नयोंकरके वह तत्वज्ञान संस्कृत हो रहा है । अथवा प्रमाण तो सकलादेशी वाक्य संस्कृत है और द्रव्यार्थिक, पर्यायार्थिक दो नये विचारी विकलादेशी वाक्योंकर के सहकार प्राप्त हैं । बौद्ध मीमांसक आदि करके उठाये गये सम्पूर्ण विवादोंका निराकरण करते करते उक्त द्वार या प्रकारसे यह सिद्धान्त प्राप्त होगया । इस प्रकार कारिकाका व्याख्यान किया जायगा, तब तो सूत्र से आयी हुयी बाधाका परिहार हो ही जाता है । ननु परव्याख्यानेऽपि न सूत्रबाधा क्रमभावि चेति च शब्दान्मतिज्ञानस्यावधिमन:पर्ययोश्च संग्रहादित्यत्र दोषमाह । फिर भी दूसरे विद्वान् अपने गिरगये पक्षका पुनः अवधारण करते हैं कि दूसरे विद्वान् के द्वारा व्याख्यान करनेपर भी कारिकाकी सूत्रसे बाधा यों नहीं आती है कि " क्रमभावि च " यों कारिका में पडे हुये च शब्द करके मतिज्ञानका और अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञानका संग्रह हो जाता है। ऐसी दशामें श्री समन्तभद्रस्वामीकी कारिकाद्वारा भी पांचों ज्ञानोंको प्रमाणपना प्राप्त हो जाता
SR No.090498
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 4
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1956
Total Pages598
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size17 MB
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