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________________ (७) परोक्ष व प्रत्यक्ष शब्दकी निरुक्तिके साथ मति श्रुतज्ञानको परोक्ष और शेष तीन ज्ञानोंको प्रत्यक्ष सिद्ध करते हुए अन्य वादियोंके द्वारा माने हुए सर्व लक्षणोमें दोषका उद्घाटन किया गया है। इसके बाद 'मतिस्मृतिसंज्ञाचिंतामिनिबोध इत्यनर्थातरम्' के प्रतिपादनसे मतिज्ञानका विस्तृत विवेचन किया है। स्मृति प्रत्यभिज्ञान आदि जितने भी भेद दृष्टिगोचर होते हैं वे सब मतिज्ञानमें या मतिज्ञानके इन भेदोमें अंतर्भूत होते हैं । इसलिए मतिज्ञानके इन प्रकारोंका नामनिर्देश किया है। स्मृति आदिकको नहीं माननेवाले वादियों के सिद्धांतको उद्धत कर उसमें अनर्थपरंपराका प्रदर्शन किया है । मतिज्ञान और उसके भेदोंको बहुत ही सुंदर विश्लेषणके द्वारा आवश्यक एवं अनिवार्य सिद्ध करते हुए महर्षिने करीब ४०० वार्तिकोंसे प्रकरणका विस्तार किया है, धन्य है । इसी प्रकार मतिज्ञानके भेदोंको प्रतिपादन करनेके लिए ' अवग्रहेवायधारणाः ' सूत्रकी व्याख्या करके मतिज्ञानका विषय, और तारतम्य आदि के द्वारा सुसंगत कथन किया है। इसी प्रसंगमें चक्षु और मनको अप्राप्यकारी सिद्ध करनेके लिए सिद्धांतसमर्थित युक्ति और तर्कसे आचार्य विद्यानंदि स्वामीने जो कौशल दिखाया है, उसे प्रकरणमें अध्ययन करते हुए परमानंद होता है। इस प्रकरणमें अन्य वादियोंकी मान्यताका भी सुंदर विवेचन किया गया है। मतिज्ञानके संबंधमें सांगोपांग, बिस्तृत विचारके बाद मूलगत श्रुतज्ञान के संबंधमें, उसके भेदप्रभेदोंके संबंध विचार किया गया है। श्रुतज्ञानके अंगबाह्य अंगप्रतिष्ठ आदि भेदोंको प्रतिपादन करते हुए श्रुत. ज्ञानकी प्रामाणिकताको सुंदर ढंगसे सिद्ध किया है। इसी प्रकरणके साथ यह भाग समाप्त होता है। इस प्रकार इस खंडमें अनेक महत्वपूर्ण प्रकरणोंका विवेचन है। दो शद्बोंसे कहा जाय तो करीब ६५० पृष्ठोमें मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका ही विचार है, इससे वार्तिककार और टीकाकारकी विद्वत्ता सहजवेद्य हो सकती है। उसके साथ ही मूल सूत्रकार उमास्वामी महाराजकी अगाधविद्वत्ताका भी पता लगता है। उन्होने गागरमें सागर भर दिया है । ग्रंथकी महत्ताका अनुभव उन प्रकरणोंको स्वयं स्वाध्याय करनेसे ही होता है। तत्वार्थसूत्रके मर्मको समझनेके लिए यह सबसे महान् ग्रंथ हैं। हिंदी टीकाकार विद्वान् पंडित ने तो इस महान् कठिन ग्रंथ को सर्व साधारणके लिए भी सहजवेद्य बना दिया है, जिसे साहित्यसंसार कभी भूल नहीं सकता है । आचार्य श्रीके प्रति श्रद्धांजलि - परमपूज्य, प्रातःस्मरणीय विश्ववंद्य आचार्य कुंथुसागर महाराजको स्मृतिमें ही यह संस्था संचालित हो रही है । आचार्यश्रीकी आंतरिक भावना यह थी कि जैनधर्मके द्वारा ही लोककल्याण हो सकता है, वही विश्वबंधुत्वको प्रस्थापित करनेके लिए समर्थ है, परंतु उसे लोकके सामने योग्य मार्गसे प्रतिपादन करनेकी आवश्यकता है, उसके मार्मिक तत्वोंके रहस्य विश्वके सामने खोलकर
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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