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________________ तत्त्वार्थचिन्तामणिः वाच्यवाचकताप्येवमिष्टानिष्टात्मनोः स्वयम् । - साधनाद्दषणाच्चापि वाग्भिः सिद्धान्यथा न तत् ॥ ११ ॥ ___इसी प्रकार संवेनाद्वैतवादियोंके यहां वाच्यवाचकभाव भी सुलभतासे सिद्ध हो जायगा। क्योंकि वे स्वयं अपने इष्टस्वरूप पदार्थका साधन वचनोंसे और अनिष्ट स्वरूप पदार्थके दूषण करनेका वचनोंसे प्रयोग करते हैं। अन्यथा यानी वाच्यवाचकभावको माने विना वह इष्टसाधन और अनिष्ट दूषण प्रतिपाद्य श्रोताओं के प्रति नहीं समझाया जा सकेगा। स्वयमिष्टानिष्टयोः साधनदूषणे परं प्रति वाग्भिः प्रकाशयित्वातीत्य वाचकभावं निराकरोति कथं स्वस्थः । नो चेत् कथमिष्टानिष्टयोः साधनदूषणमिति चिंत्यं । बौद्ध स्वयं अपने इष्टसंवेदन अद्वैतका साधन और अनिष्ट द्वैतके दूषणको दूसरे वादियों या शिष्योंके प्रतिवचनोंके द्वारा प्रकाशित करके फिर वाच्यवाचक भावका उल्लंघन कर निराकरण करता है, ऐसा बौद्ध कैसे नीरोग ( उन्मत्त नहीं ) कहा जा सकेगा। यदि वचनों द्वारा परके प्रति प्रतिपादन करना न माना जायगा तो इष्टतत्त्वका साधन और अनिष्टतत्त्वका दूषण कैसे कर सकोगे ! इसकी तुम स्वयं चिन्ता करो अर्थात्- वाच्यवाचक भावको माने विना दूसरोंके समझानेकी चिन्ता सर्वदा बनी रहेगी। गूंगेपन और बहिरेपनसे तत्त्वोंकी प्रतिपत्ति नहीं हो सकती है । संवृत्या चेत् न तया तस्योक्तस्याप्यनुक्तसमत्वात् । स्वमादिवत्संवृतमषारूपत्वात् । तदमृषारूपत्वे परमार्थस्य संवृतिरिति नामकरणमात्रं स्यात्ततो न ग्राह्यग्राहकभावादिशून्यं संवित्तिमात्रमपि शून्यसाधनाभावात् सर्वशून्यतावत् । परमार्थरूपसे नहीं किन्तु व्यवहारसे साधन, दूषणके वचन कहो सो तो ठीक नहीं । क्योंकि उस व्यवहारसे कहा गया भी वह साधन, दूषणका वचन नहीं कहा गया सरीखा ही है । जैसे कि स्वप्न, मृगी, मूर्छा आदि अवस्थाके वचन हैं। क्योंकि आपके यहां संवृत्तिको झूठस्वरूप माना है। यदि उस संवृतिको सत्यस्वरूप माना जायगा तब तो आपने यथार्थ वस्तुका नाम संवृति कर रखा दीखता है। इस प्रकार संवृतिसे वाच्यवाचक भाव है। यह वास्तविकरूपसे वाच्यवाचक भावका केवल दूसरा नाम धर लिया गया कहना चाहिये। तिस कारण ग्राह्यग्राहक भाव, बाध्यबाधक भाव, आदिसे शून्य केवल संवेदनमात्र भी तत्त्व सिद्ध नहीं हुआ। क्योंकि सर्वकी शून्यताके समान अकेले ज्ञानके अतिरिक्त पदार्थोकी शून्यताके भी साधनका अभाव है। यहांतक तीसरी, चौथी, वार्तिकका उप- संहार कर दिया गया है । .. तत्सत्प्ररूपणं युक्तमादावेव विपश्चिताम् । कान्यथा परधर्माणां निरूपणमनाकुलम् ॥ १२ ॥
SR No.090496
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 2
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1951
Total Pages674
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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