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________________ तत्वार्थचिन्तामाणः ५८३ अविद्या नहीं हो सकती है। सम्पूर्ण ही प्रतीतियां अपने आप प्रतिभासमानस्वरूप होती हैं जो स्वयं अपना सूर्यके समान प्रकाश कर रहा है, वह भला स्वभावोंसे रहित नीरूप कैसे हो सकेगा ? स्वयं प्रकाश रहा पदार्थ तो बहुत बढिया ढंगसे स्वभाववान् होता हुआ वस्तुभूत है। ग्राह्यरूपाभावान्नीरूपा मिथ्या प्रतीतिरिति चेत्तर्हि ग्राह्यरूपसहिता सम्यक् प्रतीतिरिति तद्विशेषसिद्धेः । सम्यक्प्रतीतिरपि ग्राह्यरूपरहितेति चेत् कथमिदानी सत्येतरप्रतीतिव्यवस्था ? यथैव हि सन्मात्रप्रतीतिः स्वरूप एवाव्यभिचारात्सत्या तथा भेदप्रतीतिरपि । यथा वा सा ग्राह्याभावादसत्या तथा सन्मात्रमतीतिरपीति न विद्याविद्याविभागं बुध्यामहेन्यत्र कथंचिद्भेदवादात् । ततो न सन्मानं तत्त्वतः सिद्धं साधनाघटना. दिति विधानस्यैव नानार्थाश्रयस्य सिद्धेस्तदधिगम्यमेव निर्देशादिवत् । फिर भी सत्ताद्वैतवादी यदि यों कहें कि ज्ञानसे ग्रहण करने योग्य रूपोंके न होनेसे मिथ्याप्रतीतियोंको हम नीरूप [ स्वभावरहित, तुच्छ, अवस्तु ] कहते हैं, तब तो इस प्रकार कहनेपर आपके कहनेसे ही आगया कि ग्रहण करने योग्य स्वरूपोंसे सहित जो प्रतीति है, वह समीचीन प्रतीति है । इस प्रकार उन प्रतीतियोंकी विशेषता ( भेद ) सिद्ध हुई । फिर अद्वैतवादी यदि यों कहें कि समीचीन प्रतीतियोंको भी हम ग्रहण करने योग्य स्वरूपोंसे रहित मानते हैं । ऐसा कहने पर तो हम जैन पूछेगे कि आपके यहां अब सत्य और असत्य प्रतीतियोंकी व्यवस्था कैसे होगी ! बताओ ! जब कि दोनों ही प्रतीतियां अपने ग्राह्य विषयोंको नहीं जानती हैं, तो सामान्य सत् को जाननेवाली और विशेष सत्को जाननेवाली दोनों ही प्रतीतियां सच्ची या दोनों ही झूठी बन बैठेगी । जिस प्रकार ही केवल शुद्धसत्ताको विषय करनेवाली प्रतीति सत्ता विधिस्वरूपमें ही व्यभिचाररहित होनेके कारण सत्य मान ली गयी है । तिसी प्रकार घट, पट, आदिकको विषय करनेवाली भेदप्रतीति. भी अपने विशेषस्वरूपमें ही अव्यभिचार होनेसे सच्ची बन जाओ और जैसे ग्राह्यविषय न होनेसे वह भेदप्रतीति असत्य मानी जाती है तिसी प्रकार केवल सत्ताको ही जाननेवाली प्रतीति भी बहिर्भूत ग्राह्यपदार्थ न होनेके कारण असत्य हो जायगी। आपने अभी ही समीचीनप्रतीतिका भी ग्राह्य ब्रह्म पदार्थ नहीं माना है । इस प्रकार कथंचित् भेदवादसे अतिरिक्त विद्या और अविद्याके विभागको हम कुछ नहीं समझते हैं । अर्थात्-बौद्धोंके सर्वथा विशेष (भेद) वाद और आत्माद्वैतवादियोंके सर्वथा अभेदवादको टालकर स्याद्वादियोंका कथंचित् भेदवाद ही सर्वत्र फैला हुआ है । तिस कारण केवल सत्स्वरूप ही अद्वैत तत्त्व वास्तविक स्वरूपसे सिद्ध नहीं हो पाता है । अद्वैतवादियोंके कहे हुये साधन ( हेतु ) घटित नहीं होते हैं । अर्थात्-सत्तापनेसे अविशेष या प्रतिभासमानपना आदि हेतु " सर्व एकं" को सिद्ध करनेके लिये विरुद्ध पड जाते हैं। प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे अनेक जातिवाले पदार्थ जाने जा रहे हैं । इस कारण अनेक अर्थोंमें
SR No.090496
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 2
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1951
Total Pages674
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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