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________________ ८६० मध्यमस्याद्वादरहस्ये खण्डः ३ का. १६ ** गदाधरमतोपदर्शनम् * 'यं पृथगन्वयव्यतिरेकशून्यमित्यस्य विवक्षितत्वात् । अत एव विनिगमनाविरहस्थले नान्यथासिद्धि: । 'स्वजन्यस्य यं प्रति पूर्ववृत्तित्वं गृहीत्वैव स्वस्थ तत्त्वग्रहस्तत्र स्वमन्यथासिद्धम्' (4) * नयलता है इहिले न शान्ता वासनेति न्यायापातः इति नन्वाशयः । नैयायिकाः समादधते 'यं' = पृथगन्वयव्यतिरेकशून्यं' इत्यस्यार्थस्य विवक्षितत्वात् । ततश्च पृथगन्वयव्यतिरेकशून्यं यमवच्छेदकीकृत्य यस्यावच्छेद्यस्यान्वयव्यतिरेकप्रतियोगित्वग्रहस्तेनावयेन तस्यावोदकस्य चतुर्थाऽन्यथासिद्धिरित्यर्थः फलितः । पृथक्त्वञ्चान्याघटितत्वस्वरूपमुपादेयम् । एवश्व न दण्डवेन दण्डस्य घटं प्रति चतुर्थाऽन्यथासिद्धिः । दण्डत्वस्य घटं प्रत्यन्वयव्यति रेकग्रहसम्भवी दंडादेववनयच्छेदक कृतीति दस्तक प्रामं अच्छेदकतावच्छेदकस्याऽयवच्छेदकत्मत् किन्तु अन्यादितान्वयव्यतिरेकशून्यत्वं दण्डे नास्ति, दण्डान्वयव्यतिरेकयोर्दण्डतरा घटितत्वात् । ततः पृथगन्वयव्यतिरेकयोस्तु दण्डघटितत्वेनाऽन्याऽघटितत्वलक्षणपृथक्त्व शाल्यन्वयव्यतिरेकप्रतियोगित्वशून्यत्वस्य दण्डवं सत्त्वात् प्रधगन्वयव्यतिरेकशून्यस्यावच्छेदकस्य दण्डत्वस्यावच्छेद्येन दण्डेन पदं प्रति चत॒र्धान्यधासिद्धत्वोपपत्तिः । अत एव = चतुर्थान्यथासिद्धत्वेनाभिमतावच्छेदकस्य पृथगन्वयव्यतिरेकशून्यत्वविशेषणदेव विनिगमनाविरहस्थलं नान्यथासिद्धिः । घटं प्रति दण्डस्यान्यथासिद्धत्वं दण्डसंयोगस्य वा ? इत्पत्राविनिगमें नैकस्याप्यन्यथासिद्धत्वम् । अन्यथा दण्डीकृत्य दण्डसंयोगस्य घटं प्रति अन्वयव्यतिरेकग्रादवच्छेदन दण्डसंयोगं नावच्छेदकस्य दण्डस्यान्यथासिद्धिः चतुर्धा प्रसज्येत । पृथगन्वयव्यतिरेकराहित्यस्यावछेदकविशेषणत्वापगमे तु न दण्डसंयोगेनावच्छेद्येन दण्डस्य चतुर्थान्यथासिद्धत्वप्रसङ्गः, दण्डस्य स्वंतराज्घटितान्वयव्यतिरेक प्रतियोगित्वेन निरुक्तावच्छेदकत्वविरहात् । न च दण्डसंयोगस्य दण्डवदितान्वयव्यतिरेकप्रतियोगित्वेन पृथगन्वयव्यतिरेकनिरूपित प्रतियोगित्वशून्यत्वेन दण्डेनान्यथासिद्धत्वापत्तिरिति वाच्यम्, दण्डसंयोगस्य पृथगन्वयव्यतिरेकप्रतियोगित्वशून्यत्वेऽपि नमवच्छेदकीकृत्य दण्डस्य घटे प्रत्यन्वयत्र्यतिरेकाग्रहान्न तस्य दण्डेनान्यथासिद्धत्वसम्भवः । इत्थश्च न विशेषणाभावप्रयुक्तविशिष्टावच्छेदकत्वविरहात् दण्डस्य उण्डसंयोगनान्यथासिद्धि:, न वा विशेष्यावच्छेदकत्वाभावप्रयुक्तविशिष्टविरह दण्डसंयोगस्य दण्डेनान्यथासिद्धिः । इत्थञ्च न दण्डादेर्मधो ऽन्यथासिद्धिरिति भावनीयम् । गदाधरस्तु येन रूपेण परवृद्वाकार्यं प्रति पूर्ववर्तित्वमवगम्यतं तादृशकार्य प्रति तद्रूपमन्यथासिद्धम, यथा घटादिकं प्रति दण्डत्वादिकमिति प्रोक्तवान । चतुर्थमन्यधासिद्धं निरूप्य साम्प्रतं पञ्चमान्यधासिद्धं नैयायिका प्रदर्शयन्ति स्वजन्यस्य स्वनिरूपितजन्यनाश्रयस्य चतुर्थ अन्यथासिद्ध के लक्षण में परिष्कार यं पू. । मगर इसके समाधानार्थ यह कहा जा सकता है कि पृथगन्वयव्यतिरेकशून्य जिसको अवच्छेदक बना कर जिस अवच्छेद्य के अन्वयव्यतिरेक का ज्ञान होता है उस अच्छे से अच्छेदक प्रकृत कार्य के प्रति चतुर्थ अन्यथासिद्ध होता है। - ऐसा अर्थघटन करने में किसी दोष का अवकाश नहीं है। पृथकू का मतलब है अन्य से अघटित । चतुर्थान्यथासिद्धात्मक भवच्छेदक अन्याऽघटितान्वयव्यतिरेक की प्रतियोगिता से शून्य होना चाहिए। जैसे दण्डव दण्ड का निरुक्त अदक बन सकता है वैसे दण्ड दण्डत्व का निरुक्त अवच्छेदक नहीं बन सकता है, क्योंकि जैसे घट के प्रति दण्डत्व का अन्वयव्यतिरेक अपने आश्रय दण्ड से घटित होता है वैसे घट के प्रति दण्ड का अन्वयव्यतिरेक अन्य किसीसे घटित नहीं होता है। अतः पृथगन्वयव्यतिरेकप्रतियोगिताशून्यता में रहती है, न कि दण्ड में । दण्ड में निरुक्त अवच्छेदकता नामुमकिन होने से अच्छे दण्ड से दण्ड में अन्यथामिद्धि की आपत्ति को अवकाश नहीं है। वच्छेदक के विशेषणविधया पृथगन्वयव्यतिरेकप्रतियोगिताशून्यत्व का ग्रहण करने की वजह ही तो जहाँ परस्पर में कारणत्व का विनिंगमय कोई नहीं मिलता है वहाँ एक से दूसरे की या द्वितीय में प्रथम की अन्ययासिद्धि नहीं होती है। जैसे घट के प्रति दण्ड को कारण माना जाय या उण्डसंयोग को ? यहाँ कोई विनिगमक नहीं होने से अच्छे दण्ड से अच्छे दण्डसंयोग को अन्यथासिद्ध नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दण्ड का अन्वयव्यतिरेक अन्य से घटित नहीं होने से पृथगन्वयव्यतिरेकप्रतियोगिता शुन्यतास्वरूप अवच्छेदकविशेषण दण्डसंयोगावच्छेदकविधया सम्मत दण्ड में नहीं रहता है । इस तरह दण्डादि से चक्रादि में या चक्रादि से दण्डादि में अन्यथामिद्धि की आपत्ति को अवकाश नहीं है । इस तरह संक्षेप से चतुर्ध अन्यथा सिद्ध का निरूपण पूर्ण हुआ । अब चरम एवं पंचम अन्यथासिद्ध का निरूपण हो रहा है । सुनिये, * कुलालपिता पथम अन्यथासिद नवज । अपने से जन्य में प्रकृत कार्य के प्रति पूर्ववृत्तित्व का ज्ञान होने पर ही अपने में प्रकृत कार्य के प्रति पूर्ववृत्वि
SR No.090488
Book TitleSyadvadarahasya Part 3
Original Sutra AuthorYashovijay Upadhyay
Author
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size16 MB
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