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________________ ६५६ मध्यमस्याद्भादरहस्ये खण्डः ३ का ५ * पाकजचित्रप्रतिक्षेपः स हेतुः फलबलेन वैजात्यकल्पनात् । तेन नोभराज उभयो: पृथक्कारणत्वकल्पनम् । पाकजचित्रे वा मानाभाव:, पाकादवयवे नानारूपोत्पत्त्यनन्तरमेवाऽवयविनि चित्रस्वीकारे लाघवादित्येके । ॐ जयलवा क्षै पोत्पत्तिः सङ्गच्छते । नीलेतरादिषट्कादेः तत्कारणत्त्वपक्षे तु नेयं घटामञ्चति तत्र तद्विरहात् । लाघवानुरोधेन कल्पान्तरमाविष्कुर्वन्ति रूपमात्रजाऽतिरिक्के = अवसमवेतरूपमा जम्पचित्ररूपातिरिक्तचित्ररूपे, एवकारेणाऽग्निसंयोगज. चित्ररूपव्यवच्छेदः कृतः । बाकारः कल्पान्तरप्रदर्शनार्थः । सः = विजातीयतेजः संयोगः स्वसमवायिसमवेतत्वसम्बन्धेन हेतुः । कल्पान्तरानुसरणप्रयोजनं स्वपदमेव दर्शयिष्यते प्रकरणं । फलबलेन = अन्वयव्यतिरेकमहिम्ना, वैजात्यकल्पनात् चित्रजनकानिसंयोगसमवेतजातिविशेषस्य सिद्धेः । एतेन अभिसंयोग जन्यचित्ररूपनिरूपितकारणतावच्छेदकीभूतवैजात्याऽसिद्धेः न विजातीयतेजःसंयोगस्य तद्धेतुत्वसम्भव इति प्रतिक्षितम्, अग्निसंयोगत्वावच्चिन्नस्य तद्धेतुत्वकल्पने सर्वस्मिन घटादी चित्रोत्पादसङ्गात्, तेजः परमाणुसंयोगस्य तत्र सर्वदा सन्तात् । न चैतद्दृष्टमिष्टं वेति तदन्यथानुपपत्त्या सिद्धो धर्म एको नित्यश्चतु तदा लाघवम' तिन्यायात् तज्जनकाग्निसंयोग जातिविशेषः सिध्यतीति भावः । तेन = विजातीयाग्निसंयोगनिष्ठजनकतानिरूपितजन्यतावकेदकधर्मः रूपमात्रजातिरिक्तचित्रत्वं न तु तेज: संयोगजचित्रत्वमित्यभ्युपगमेन न उभयजे = नीलेतरादिपाकोभयजन्ये चित्ररूपं उभयोः नीलंतरादि- पाकयोः पृथक्कारणत्वकल्पनम्, तस्य विजातीयतेज:संयोगकार्यतावच्छेदकाकातत्वात् । विजातीयतेजः संयोगमात्रजचित्र • पाकरूपी भयजचित्रयोः रूपमात्रज भिन्नत्वेनानुगतीकृत्य तो प्रति पाकस्य हेतुत्वसम्भव इति भावः । प्रकृतकल्पे व समवायेन रूपमात्रजं चित्रं प्रति स्वसमवायसमवेतत्वसम्बन्धेन नीलेतरादिषट्कस्य रूपमात्रजचित्रातिरिक्तचित्रं प्रति च विजातीयतेजः संयोगस्य कारणता कल्पत इति कार्यकारणभावजयकल्पनम् । अन्पन्न तु अवयवरूपषाको भयजचित्रं प्रति अवयवरूप - पाकमी: मिलितयो: कारणत्वकल्पनमधिकमिति ज्यायानयमेव पक्षः । = ननु रूपमात्रजचित्रातिरिक्तचित्रे विजातीयतेजः संयोगत्वेन कारणत्वं यदुत अग्निसंयोगमात्रजचित्रातिरिक्तचित्रेऽवयवरूपत्वेन हेतुत्वं ? इत्यत्र विनिगमनाविरहो दुरुद्धर: उभयजचित्रे उभयोः पृथक्कारन्याऽकल्पनं तुभयत्र तुल्यमिति नोपदर्शिनकार्यकारणभावः श्रद्धातुमईतीत्याशङ्कायां कल्पान्तरमाह् पाकजचित्रे वा मानाभाव इति । नन्वन्वयव्यतिरेकाभ्यां पाकात् = विजातीयतेज: संयोगात् अवयवे = अवयवेषु नानारूपोत्पत्त्यनन्तरं नीलपीतादिनानाविधवत्पादानन्तरक्षण एव न तु तत्पूर्वं अवयविनि चित्रस्वीकारे अतिरिक्तकार्य कारणभावाकल्पनेन लाघवात् । पाकावापरमाण्वन्तमवयवविनाशी भवतु मा वा । अब नास्माकमाग्रहः अभावत्व आदि रूप से कारणता के स्वीकार का गौरव प्रसक्त होता नहीं है । रूपजन्य चित्र रूप के प्रति विजातीयसंयोग नहीं बल्कि स्वाश्रयसमवेतत्वसम्बन्ध से नीलेतर आदि रूप कारण होने से कारणता अवच्छेदकधर्मशरीर में नीलजनकतेजः संयोग | के निवेश की कोई आवश्यकता नहीं है। चित्ररूपकारणतावच्छेदकधर्मघटकीभूत अभिसंयोगनिष्ठ वैजात्य की कल्पना का गौरव आपातत: प्रतीत होने पर भी वह दोपात्मक नहीं है, क्योंकि वह फलबल से कल्प्य होने से प्रामाणिक है। अग्निसंयोगसामान्य से पाकन चित्र रूप उत्पन्न नहीं होता है, किन्तु असंयोगविशेष से ही पाकन चित्र रूप उत्पन्न होता है। यदि ऐसा न माना जाय तो प्रायः सभी द्रव्य के साथ अभिपरमाणुओं का संयोग होने से सर्व रूपी वन्य में पाकजन्य चित्र रूप की उत्पत्ति का अनिष्ठ प्रसंग आयेगा | अन्वयव्यतिरेक में अग्निसंयोगविशेष में ही पाकज चित्र रूप की कारणता का निश्वय होने से चित्रपौत्पादक अभियोग में वैजात्य = जातिविशेष की कल्पना न्याय्य है । अथवा हम यह भी कह सकते हैं कि रूपमात्र से जन्य चित्र रूप से अतिरिक्त चित्र रूप के प्रति ही विजातीय अग्निसंयोग कारण है । इस कार्यकारणभाव को मान्य करने का लाभ यह है कि अवयवरूप और गाव उभय से जन्य चित्र रूप के प्रति अवयवरूप और पाक = विजातीय अभियोग दोनों में स्वतंत्र कारणता की कल्पना का गौरव प्रसक्त होता नहीं है, क्योंकि रूपमात्रजन्पचित्ररूपातिरितवित्रत्वस्वरूप पाककार्यतावच्छेदक धर्म से वह चित्र रूप आकान्त है। इस पक्ष में रूपमानजन्य चित्र रूप के प्रति स्वसमवायसमवेतत्व सम्बन्ध में नीलेतर आदि रूप कारण है और लदनिरिक रूपमात्रजन्य चित्ररूप से भिन्न) चित्र रूप के प्रति विजातीयतेजः संयोग कारण है । इन दो कार्यकारणभाव की ही कल्पना करनी पड़ती है । उभयजन्य चित्र रूप के प्रति स्वसमवायसमवेतत्वसम्बन्ध से नालेतरादिपदक और पाक इन दोनों में कारणता की कल्पना का गौरव अप्रसक्त हैं । पाक इति । अथवा यह भी कहा जा सकता है कि चित्ररूप केवल अवयवसमवेत रूप से ही उत्पन्न होता है, न कि पाक से क्योंकि पाकजन्य चित्र रूप के स्वीकार में कोई प्रमाण नहीं है। यहाँ यह शंका हो कि 'नीलकपाललय
SR No.090488
Book TitleSyadvadarahasya Part 3
Original Sutra AuthorYashovijay Upadhyay
Author
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size16 MB
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