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मध्यमस्याडादरहस्ये खण्डः २
महामहोपाध्यााजी के उद्धार → यस्य सर्वत्र समता नयेषु ततोष्वेिव । तस्थालेकालतवादस्य क्व क्यूनाधिकशेमुषी ।।
अध्यात्मोपनिषत् १/६५) जैसे माता को अपने सब बच्चों के प्रति समान प्यार होता है ठीक वैसे जिस अनेकान्तवाद को सब नयों के प्रति समान हदि होती है उस स्यादात को एक लय में हीनता की बुद्धि और तय नय के प्रति उच्चता की बुन्दि कैसे होगी ? अर्थात किसी भी जय में हीनता या उच्चता की बुद्धि स्याहार को नहीं होती है।
ग्रंथशरीरपरिचय
पत्रक्रमांक
(III)
प्रकाशकीय वक्तव्य प्रास्ताविक विषयमार्गदर्शिका प्रस्तुत प्रकरण - द्वितीय खण्ड परिशिष्ट (लघुस्याद्वादरहस्य-सम्पूर्ण)
(IV) (XUF) २१८-५४८ (1-18)
संशोधक न्यायादिशास्त्रमर्मज्ञ तपोस्त मुनिप्रवरश्री पुण्यरत्नविजयजी महाराज
कोम्प्युटर्स टाईप सेटींग प्रथम आवृति व
थ्री पाच कोम्प्युटर्स, वि.सं. २०५२ ( मूल्यः रु. १४५... )
| ३३, auel सोसारा, केरान पर,
घोडासर, सहमदावाद-३८००१0. नकल - ६००
__फोt :- 396246
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