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________________ · ३३३ मध्यमस्याद्वादरहस्ये खण्डः २ का. ५ चक्षुःसंयोगकारणतावादिमतप्रकटीकरणम् * अथ चक्षुः संयोगस्यैव निरुक्तसम्बन्धेन तथात्वमस्तुरभिभूतरूपवदालोकसंयोगत्वस्य चाक्षुषानभिभूतरूपवदालोकसंयोगत्वस्य वाऽपेक्षया चक्षुः संयोगत्वस्य कारणतावच्छेदकत्वे लाघवादिति चेत् ? न, सम्बन्धविधया तत्प्रवेशे तवाऽपि साम्यात् । सम्बन्ध *नयलता = स्वावच्छेद मुपदर्शयति अथेति । चक्षुः संयोगस्यैवेति । एवकारेणालोकसंयोगव्यवच्छेदः कृतः । निरुक्तसम्बन्धेन कावच्छिन्न- महदुद्भूतानभिभूतालोकसंयोगसंसर्गेण तथात्वं = द्रव्यचाक्षुषहेतुत्वं अस्तु । ननु महदुद्भूतानभिभूतालोकसंयोगस्य एवं स्वावच्छेदकावच्छिन्नचक्षुः संयोगसंसर्गेण द्रव्यचाक्षुप हेतुत्वं किं बाधकमस्ति येन भवदुपदर्शितकार्यकारणभावः स्वात्मप्रतिष्ठां | लभेत ? इत्याशङ्कायां पर आह महदुद्भूतानभिभूतरूपवदालोकसंयोगत्वस्येति । अस्याऽग्रे 'कारणतावच्छेदकत्वे' इत्यत्राऽन्वयः । नैयायिकः प्रतिवादिमते संभवल्लघुकारणतावच्छेदकमाह चाक्षुषानभिभूतरूपवदालोकसंयोगत्वस्य वेति । महत्परिमाणोद्भूतरूपाश्रयस्यैव परमते चाक्षुषत्वसम्भवात् तत्स्थाने 'चाक्षुषे' त्युक्तम् । शेषं पूर्ववत् । चक्षुः संयोगत्वस्य कारणतावच्छेदकत्वे = द्रव्यचाक्षुषकारणतावच्छेदकत्वे लाघवादिति । कारणतावच्छेदकधर्मशरीरलाघवादिति । आलोकसंयोगस्य निरुक्तसंसर्गेण तत्कारणत्वे महद्दुद्भूतानभिभूतरूपवदालोकसंयोगत्वं चाक्षुषानभिभूतरूपवदालो कसंयोगत्वं वा तत्कारणतावच्छेदकं स्यात् । चक्षुः संयोगस्य निरुक्तसंसर्गेण तथात्ये तु चक्षुः संयोगत्वमेत्र तत्कारणतावच्छेदकं स्यात् । तत्र चक्षुः संयोगत्वस्यैव लघुत्वाच्चक्षुःसंयोगस्यैव निरुक्तसम्बन्धेन तद्धेतुत्वं कल्पयितुमुचितमिति अथाशयः । - - आलोककारणतावादी तन्निराकुरुते नेति । सम्बन्धविधया = कारणतावच्छेदकसंसर्गरूपेण तत्प्रवेशे = महदुद्भूतानभिभूतरूपवदालोकसंयोगत्व- चाक्षुषानभिभूतरूपवदालोकसंयोगत्वाऽन्यतरनिवेशे, तब नैयायिकस्य अपि साम्यात् = तुल्यगीरवात् । चक्षुःसंयोगस्य तद्धेतुत्वे तूपदर्शितगुरुतरधर्मघटित द्रव्यचाक्षुषकारणतावच्छेदकसम्बन्धे यादृशं गौरवं तादृशमेव गौरवं महदुद्भूतानभिभूतरूपवदालोकसंयोगस्य तत्कारणत्वे मम द्रव्यचाक्षुषकारणतावच्छेदकधर्म इति तुल्यगौरवमुभयपक्षे । ननु कारणतावच्छेदकधर्मशरीरगौरवमेव दूषणं न तु कारणतावच्छेदकसम्बन्धवशरीरगौरवमित्याशङ्कायां स्याद्वाद्याह- सम्बन्धदोनों में अकारणता दोनों में कारणता मानने में तो भारी गौरव है और एक को भी कारण न मानने पर आलोक में अन्यत्व की सिद्धि न हो सकेगी । * धर्मगौरव की भाँति सम्बन्धगौरव भी दोष स्यादादी अथ च इति । यदि यहाँ नैयायिक की ओर से ऐसा कहा जाय कि “विषयता सम्बन्ध से द्रव्यचाक्षुप के प्रति स्वावच्छेदकावच्छिन्नचक्षुः संयोग सम्बन्ध से आलोकसंयोग का कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि गाव अन्धकारस्थित द्रव्य के साथ आलोकपरमाणु का चक्षुरश्मिस्वरूप आलोक को एवं सुवर्णात्मक आलोक का संयोग होने पर भी उस द्रव्य का चाक्षुष नहीं होने से द्रव्यचाक्षुषकारणतावच्छेदक धर्म आलोकसंयोगत्व नहीं हो सकता किन्तु महदुद्धृतानभिभूतरूपवदालोकसंयोगत्व हो सकता है अथवा चाक्षुषानभिभूतरूपवदालोकसंयोगत्व । महत्परिमाण एवं उद्धृत रूपवाले द्रव्य का ही चाक्षुष साक्षात्कार होने से बढ़ चाक्षुष भी कहा जा सकता है । मगर यह कारणतावच्छेदक धर्म अत्यन्त गुरु है । इसकी अपेक्षा चक्षुसंयोग को ही दर्शितसम्बन्ध से द्रव्यचाक्षुप का कारण मानना उचित है, क्योंकि तब कारणतावच्छेदक धर्म चक्षुसंयोगत्व ही होता है, जो अत्यन्त लघु हे । अतः आलोकसंयोग को द्रव्यचाक्षुष का कारण मानने की अपेक्षा चसंयोग को ही उसका कारण मानना उचित है" <- तो यह भी असंगत है। इसका कारण यह है कि आलोकसंयोग को स्वावच्छेदकावच्छिन्नचक्षुसंयोगसम्बन्ध से द्रव्यचाक्षुष का कारण मानने पर हमारे मत में जैसे कारणतावच्छेदक धर्म के शरीर में गौरव है, ठीक वैसे ही आप नैयायिक महाशय को बक्षुसंयोग को स्वावच्छेदकावच्छिन्नमदुद्भूताऽनभिभूतरूपवदालोकसंयोगसम्बन्ध से द्रव्यचाक्षुष का कारण मानने की वजह कारणतावच्छेदकसम्बन्ध के शरीर में गौरव होता है । हमारे अभीष्ट कारणतावच्छेदकधर्म का आप नैयायिक विद्वान् कारणतावच्छेदकसम्बन्ध के घटकरूप में स्वीकार करते हैं । अतः द्रव्यचानुपकारणतावच्छेदकधर्मवशरीर में जो हमारे मत में गौरव प्रसक्त होता है, वही गौरव आप नैयायिक मनीषी के पक्ष में द्रव्यविपयकचानुपकारणतावच्छेदकसम्बन्धशरीरांश में है । अतः आपके अभिमत कार्य कारणभाव की अपेक्षा हमारे अभीष्ट कार्य कारणभाव के अंगीकार में ज्यादा गौरव नहीं है, तुल्य गौरव है । यहाँ यह भी नहीं कहना चाहिए कि > "कारणतावच्छेदक धर्म के शरीर में जो गौरव है, वही दोषात्मक है, न कि कारणतावच्छेदक सम्बन्ध शरीर में प्रविष्ट गौरव भी । इसलिए विषयतासम्बन्ध से द्रव्यविषयक चाक्षुप साक्षात्कार के प्रति चक्षुसंयोग को कारण मानने पर कारणतावच्छेदक संबन्ध के शरीर में जो गौरव प्रसक्त होता है वह -
SR No.090487
Book TitleSyadvadarahasya Part 2
Original Sutra AuthorYashovijay Upadhyay
Author
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages370
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size17 MB
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